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तब उसने खत लिखा

शचीन्द्र आर्य वह कभी अकेले निकल जाता और किसी पेड़ के नीचे बैठ दिमाग में घूमती हर बात को सुनने की कोशिश करता। आज शाम अंधेरे के साथ बरसात में सड़कें गीली थीं। इतने सालों में उसने कभी ध्यान से नहीं सोचा, लगातार उस चारदिवारी में उसकी बातों की जगह सिमट कर उसकी जेब के […]

Author April 21, 2015 10:10 PM

शचीन्द्र आर्य

वह कभी अकेले निकल जाता और किसी पेड़ के नीचे बैठ दिमाग में घूमती हर बात को सुनने की कोशिश करता। आज शाम अंधेरे के साथ बरसात में सड़कें गीली थीं। इतने सालों में उसने कभी ध्यान से नहीं सोचा, लगातार उस चारदिवारी में उसकी बातों की जगह सिमट कर उसकी जेब के आसपास रह गई। वह वहीं इन भावों को किसी चित्रकार की तरह उतार लेना चाहता, पर उसकी बगल में वह भी नहीं थी। उसे कुछ तो उसके न होने ने अकेला कर दिया, फिर इस खयाल ने कि जब वह अभी कुछ देर बाद घर लौटेगा, उसकी आवाज भी वहां नहीं होगी। उसे अकेले ही सब फिर से संभालना होगा। मन की परतों में छिप गई बातों को शब्दों में ढाल कर उसे कहे और सुने जाने के दरमियान एक बार फिर से बुनने की कोशिश शुरू कर देनी थी। कभी वह अकेले कमरे में किसी के न होने पर उन्हें बड़बड़ाते हुए दोहराता, पर सामने पड़ते ही कुछ कह न पाता। कहना, उसे कुछ टूट जाना लगा। फिर वह कुछ भी तोड़ देने के हक में नहीं रहा होगा। इसलिए सब कुछ अंदर ही अंदर निगलता रहा। उसे लगता कितनी ही बातें उमड़ती-घुमड़ती रहीं, जिन्हें वह कह नहीं सका होगा।

वह धीरे-धीरे उनसे बात करने की आखिरी कोशिश याद करता रहा। उसकी याद उस रात होती शाम पर ठहर गई, जब वह महीने भर की उलझन के बाद अपने दिल को उनके सामने खोल देना चाहता रहा। उस बार वह उस लड़की की बात कर लेने का मन बनाता रह गया, जिसके लिए उसे दिल के किसी कोने में एक मुलायम कोना लगातार बनता रहा था। वह चाह कर भी अपने प्यार को नहीं कह पाया। अंदर ही धागे उलझ कर रह गए। फिर कई सालों बाद उसने यह बात अपनी परछार्इं को बताई। फिर परछार्इं ने किसी को नहीं कहा। वह उसी की तरह चुप रहने लगी। इस तरह वे अब एक नहीं दो हो गए। उसने उसे एक और नाम दिया, डायरी। दोनों छिप कर कहीं अंधेरे कमरे में मिलते। उसमें रोशनी की एक किरण दोनों को एक बार फिर मिला देती। दोनों मिलते, चुप रहते। कहने को होते तब भी चुप हो एक दूसरे में डूब जाते।

इस तरह उसने उसे एक और नाम दिया, उदासी। खाली बेकार पन्नों की तरह उसका मन भी उदास अनमना होता रहता। तब वह खुद को कमरे में बंद कर लिया करता। सबको लगता वह अकेला है। पर नहीं, उसकी उदासी उस खाली कमरे में अकेले नहीं रह पाती। ये बातें न कह पाना उसे चिड़चिड़ा बनाता। फिर भी वह कुछ कहता नहीं। सब सुन कर भी जज्ब किए रहता। कोई उसे देखता तो उसे बातों को सोखने वाला सोख्ता कहता। पर वह किसी को दिखाई कहां देता, जब खुद अपने घर में किसी को नजर नहीं आता। उसने एक तरकीब सीख ली। वह अब उस घर में रहते हुए भी घर में नहीं रहता। कोई बहाना बना कर उन्हें गुस्सा करने का बहाना दे देता और इसकी ओट में अपनी बातें लिए छिपा रहता।

कहने को वह एकदम जिद्दी हो गया, पर उसे याद नहीं कि पिछली बार अपने मन की एक बात कहने की जिद उसने कब की! उसे कही बातें अंदर तक चुभ जातीं। शायद कही भी इसीलिए जाती थीं। वह उन सब बातों को अपने मन की उदासी के साथ दर्ज कर छिपाता जाता। किसी को पता नहीं चल पाता कि कुछ ऐसा है, जो लगातार टूट रहा है। इस बार बात किए कई साल और बीत गए। उसने इस बार उन्हें अपने मन की बात कहने का मन बनाया। इस बार उसने डायरी में कुछ नहीं लिखा। उसने इस बार एक आठ पन्नों का खत लिख कर अपनी डायरी में रख लिया। उसे पता है, वह कभी उसे पोस्ट नहीं कर पाएगा।

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