ताज़ा खबर
 

गरमी का परदा

हाल ही में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में गरमी की वजह से एक हजार से ज्यादा लोगों की मृत्यु हो गई। एक तरफ मौसम की, तो दूसरी तरफ सियासत की गरमी लोगों को तपा रही है। राह में चलता हुआ एक मुसाफिर अगर कहीं बड़े गड्ढे में पानी भरा देखता है,

Author June 10, 2015 9:00 PM
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में गरमी की वजह से एक हजार से ज्यादा लोगों की मृत्यु हो गई। एक तरफ मौसम की, तो दूसरी तरफ सियासत की गरमी लोगों को तपा रही है।

हाल ही में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में गरमी की वजह से एक हजार से ज्यादा लोगों की मृत्यु हो गई। एक तरफ मौसम की, तो दूसरी तरफ सियासत की गरमी लोगों को तपा रही है। राह में चलता हुआ एक मुसाफिर अगर कहीं बड़े गड्ढे में पानी भरा देखता है, तो उसका मन उसमें कूद जाने का होता है, भले उसे तैरना न आता हो। ऐसी धूप में जल कर मरने से अच्छा है, ठंडे पानी में डूब कर मर जाना। आजकल तो डूब कर मरना भी कोई आसान काम नहीं है क्योंकि डूबने से पहले पानी में मौजूद गंदगी और बैक्टीरिया व्यक्ति को मार देते हैं।

सियासत की बात करें तो एक तरफ मोदी सरकार का एक साल पूरा हो गया है और दूसरी तरफ केजरीवाल सरकार के सौ दिन पूरे हुए। अब बारी है अपनी-अपनी उपलब्धियों के ढोल पीटने की। मोदीजी तो इस मामले में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। रैलियों का एक सिलसिला जारी है।

यही है सियासत की गरमी, जिसमें आम आदमी तप रहा है। उसकी समझ में ही नहीं आ रहा है कि आखिर वह डूबे तो कहां डूबे? पानी की समस्या गंभीर है। पीने को पानी मिलता नहीं है, फिर डूबने के लिए तो ज्यादा पानी चाहिए। आजकल नदियों की भी ऐसी हालत है कि उनमें उतरने का मन नहीं करता।

ऐसे में बेचारा किसान अगर पेड़ से लटक कर आत्महत्या न करे तो क्या करे! सियासी गरमी में तप कर मरना भी कम कष्टदायी नहीं है। एक तरफ आम आदमी इसे झेल रहा है, दूसरी ओर आम आदमी पार्टी भी परेशान है। दिल्ली के हाथ आज भी केंद्र शासित प्रदेश और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की डोर से बंधे हुए हैं। ऐसे में कुछ थाली के बैंगन, जिन्हें चाटुकारिता के बल पर बड़े अधिकार मिल गए हैं, खुद को प्रसिद्ध करने के तमाम हथकंडे अपना रहे हैं। असलियत सभी को पता है।

एक तरफ आंध्र प्रदेश में गरमी से मरने वालों का आंकड़ा डेढ़ हजार पार कर चुका है और दूसरी ओर भुवनेश्वर में पानी के लिए त्राहि-त्राहि मची हुई है। विकसित राष्ट्र का सपना दिखाने वाले लोग अपनी पार्टी और प्रसिद्धि के विकास में लगे हुए हैं। खबरों के मुताबिक भुवनेश्वर में एक लड़की को पानी के लिए पड़ोसी के घर जाना पड़ता था और उसकी कीमत अपने शारीरिक शोषण से चुकानी पड़ती थी। ऐसी घटनाएं हम सबके लिए शर्म की बात हैं।

अब चुल्लू भर पानी में किसे डूबना चाहिए, यह निर्णय वही कर लें, जो देश के ठेकेदार हो गए हैं। हालांकि वे डूबने की सलाह किसी को भी दे सकते हैं, क्योंकि एसी में बैठ कर ऐसी समस्याओं का अहसास करना मुमकिन नहीं होता। हमें कोई एतराज नहीं है आपकी सुख-सुविधाओं से, क्योंकि आपका जन्म मानवता के कष्ट दूर करने के लिए हुआ है और हमारा जन्म मानवता के नाम पर डूब मरने के लिए हुआ है! हमें तो बस मरने का बहाना चाहिए। सर्दियों में ठंड से मर जाते हैं, बरसात में बाढ़ में बह जाते हैं और गरमियों में तप कर मर जाते हैं।

हमें बड़ा भरोसा है आप पर कि इतने के बाद भी आप देश को जल्दी ही विकसित कर देंगे! यह गरमी का मौसम भी चला जाएगा, लेकिन सियासी गरमी रूप बदल-बदल कर तपती रहेगी। हमारे पास काम ही क्या है! हम हर मौसम में मरने के अलग-अलग बहाने ढूंढ़ते रहेंगे। जिन्हें मौसम के अनुकूल बहाना न मिले, उनके लिए सियासी गरमी में जल कर मरने का विकल्प हमेशा खुला है। जिन्हें चुल्लू भर पानी में डूबना चाहिए, उन्हें फुर्सत ही नहीं है। चलो हम ही कहीं पानी की तलाश करते हैं!

अंकित ओझा

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App