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भोजन माता का दुख

सरकारी विद्यालयों में जहां मध्याह्न भोजन की व्यवस्था है, वहां कोई न कोई महिला भोजन बनाती है। वह महिला स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के लिए भले ‘भोजन माता’ हो, लेकिन सरकार के लिए वह केवल लाचारी और बेबसी में अपने श्रम से समझौता करने वाली एक साधारण महिला होती है। वह सौ-डेढ़ सौ या […]

Author Updated: July 14, 2015 5:59 PM

सरकारी विद्यालयों में जहां मध्याह्न भोजन की व्यवस्था है, वहां कोई न कोई महिला भोजन बनाती है। वह महिला स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के लिए भले ‘भोजन माता’ हो, लेकिन सरकार के लिए वह केवल लाचारी और बेबसी में अपने श्रम से समझौता करने वाली एक साधारण महिला होती है।

वह सौ-डेढ़ सौ या उससे ज्यादा बच्चों के लिए खाना बनाने से लेकर खिलाने और कहीं-कहीं बर्तन धोने तक का कठोर श्रम करती रहती है। काम के प्रति ईमानदारी और मेहनत का मूल्य सरकार के पैमाने में सिर्फ एक हजार रुपए है। यह राशि स्थायी अध्यापकों के प्रतिदिन के वेतन से भी कम है। कोई कह सकता है कि शिक्षक मानसिक श्रम करता है। लेकिन मैं पूछना चाहूंगा कि क्या जीवन की बुनियादी जरूरतों में भी फर्क होता है? काम के प्रति किसकी ईमानदारी संदिग्ध है और किसकी असंदिग्ध, इसे बताने की जरूरत नहीं।

चाहे वह शिक्षक हो या शिक्षामित्र, सभी अपने हितों को लेकर न्याय और इंसाफ की मांग संसद से लेकर सड़क तक उठाते रहते हैं। लेकिन इनका न तो कोई संगठन है और न न्याय पाने का रास्ता इन्हें पता है। बुनियादी ढांचे के आकलन के दौरान एक साथी ने बताया कि जब वे विद्यालय गए तो सबसे पहले खाना बनाने वाली बुजुर्ग महिला गेट पर आई और उन्हें अधिकारी समझ कर बोली- ‘साहब, हमारा मानदेय बढ़वा दो।

बहुत समय से मानदेय नहीं बढ़ा है!’ इससे पता चलता है कि वह अंदर से कितनी व्यथित है। आज तक मैंने समस्याओं की लंबी फेहरिस्त बताने वाले किसी शिक्षक को ‘भोजन माता’ की समस्या को उठाते नहीं सुना। उलटे वे मध्याह्न भोजन को बंद कराने की वकालत जरूर करते हैं। सच्चाई यह भी है कि इसके खिलाफ वही शिक्षक बोलते रहे हैं जो नहीं जानते कि भूख की पीड़ा क्या होती है। कहा जाने लगा है कि सोमवार को बच्चा अधिक खाता है, क्योंकि रविवार को स्कूल की छुट्टी होती है और घर पर भी खाना मयस्सर नहीं हो पाता। इन बच्चों के प्रति कुछ लोग क्या-क्या उपमाएं देते हैं, यह छिपा नहीं है।

मैं ऐसे विद्यालयों में भी गया हूं जहां कई शिक्षक अपना समय सिर्फ बातों में गुजार लेते हैं या तबियत हुई तो एकाध कक्षा में पढ़ा लेते हैं। उन्हें ‘भोजन माता’ को चूल्हे के धुएं से जूझते देख कर भी कर्तव्यबोध नहीं हो पाता और वे अखबार में इस उम्मीद से आंखें गड़ाए रहते हैं कि सातवां वेतन आयोग कब लागू होगा।

इस प्रकार का शोषण और अन्याय किसी निजी जगह पर भले सामान्य लगे, लेकिन बराबरी का दावा करने वाली सरकार और उसके संस्थानों में ऐसा अन्याय हमारी व्यवस्था की पोल खोलता है। इसमें लैंगिंग असमानता भी झलकती है। इतने कम वेतन में शायद कोई पुरुष ऐसा काम करने को तैयार नहीं हो। लेकिन महिला के श्रम को जिस तरह घरों में आंका जाता है, वही पैमाना सरकार का भी है।

आधारभूत आकलन के दौरान प्रारूप में बच्चे की सामाजिक-आर्थिक स्थिति जानने का एक कॉलम था- ‘तुम्हारी मां क्या काम करती है?’ ज्यादातर बच्चे ने कहा कि ‘कुछ नहीं करती!’ यानी काम वही है जो खाना बनाने-खिलाने के अलावा हो। मैंने कहा कि अगर तुम्हारी मां घर में एक दिन का भी हड़ताल कर दे तो क्या तुम इतने अच्छे से स्कूल आ पाते? बच्चे शरमा कर अपनी गलती का अहसास करते थे। मुझे अपनी उस ‘भोजन माता’ की याद आ रही है, जिन्होंने पहली बार विद्यालय जाने पर मना करने के बावजूद मां की तरह अपने खुरदुरे हाथों से मुझे थाली दी और उसमें खाना परोस दिया था। स्कूल का विलय होने के बाद वे न जाने कहां जूझ रही होंगी!

जितेंद्र यादव

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