ताज़ा खबर
 

भ्रम की शिक्षा

मनोज चाहिल इस साल फिर पुस्तक मेला फरवरी में आयोजित होने वाला है। लेकिन मेरे लिए पिछले साल का पुस्तक मेला भी खास था। एक स्टॉल पर भीड़ देख कर मैं उस दुकान के भीतर गया। वहां कई धार्मिक पुस्तकों के अलावा बहुत-सी नसीहत देने वाली किताबें भी रखी थीं। मेरी नजर ‘नारी-शिक्षा’, ‘नारी धर्म’, […]

मनोज चाहिल

इस साल फिर पुस्तक मेला फरवरी में आयोजित होने वाला है। लेकिन मेरे लिए पिछले साल का पुस्तक मेला भी खास था। एक स्टॉल पर भीड़ देख कर मैं उस दुकान के भीतर गया। वहां कई धार्मिक पुस्तकों के अलावा बहुत-सी नसीहत देने वाली किताबें भी रखी थीं। मेरी नजर ‘नारी-शिक्षा’, ‘नारी धर्म’, ‘आदर्श नारी सुशीला’ और ‘भक्त नारी’ आदि शीर्षक वाली पुस्तकों पर पड़ी। शिक्षा का विद्यार्थी होने और ‘महिला शिक्षा’ में रुचि रखने के कारण मुझे इन पुस्तकों के अध्ययन में दिलचस्पी पैदा हुई और मैंने खरीद ली। एक अहम बात यह थी कि बढ़िया कागज और छपाई के साथ ये पुस्तकें बहुत कम दामों पर उपलब्ध थीं। मसलन, ‘नारीधर्म’ नामक पुस्तक के ब्योरे के मुताबिक यह उसका उन्नीसवां पुनर्मुद्रण था, उसकी कुल चौदह लाख पचहत्तर हजार दो सौ पचास प्रतियां बाजार में आ चुकी हैं और आज भी वह मात्र पांच रुपए में उपलब्ध है।

मैंने ऐसी कई किताबें खरीदीं और पढ़ डालीं। इनमें से एक ‘नारी-शिक्षा’ की शुरुआत लिखने वाले के इस वाक्य से होती है- ‘स्त्री-धर्म के विषय में न तो मुझे विशेष ज्ञान है और न मैं अधिकारी ही हूं, तथापि अपनी साधारण बुद्धि के अनुसार कुछ लिखने का प्रयास कर रहा हूं।’ इसके तुरंत बाद लेखक अपनी ‘साधारण बुद्धि’ से यह निष्कर्ष निकाल लेता है जो पुस्तक का पहला बिंदु है- ‘स्वतंत्रता के लिए स्त्रियों की अयोग्यता’। इसमें कहा गया है- ‘स्त्री जाति के लिए स्वतंत्र नहीं होना ही सब प्रकार से मंगलदायक है। पूर्व में होने वाले ऋषि-महात्माओं ने स्त्रियों के लिए पुरुषों के अधीन रहने की जो आज्ञा दी है, वह उनके लिए बहुत ही हितकर जान पड़ती है।’ इसी प्रकार तुलसीदास को उद्धृत करते हुए कहा गया है कि ‘स्त्रियों में काम, क्रोध, दुस्साहस, हठ, बुद्धि की कमी, झूठ, कपट, कठोरता, द्रोह, ओछापन, चपलता, अशौच, दयाहीनता आदि विशेष अवगुण होने के कारण वे स्वतंत्रता के योग्य नहीं हैं!’ अन्य पुस्तकें भी इसी तरह की ‘असाधारण बुद्धि’ के लेखकों ने लिखी हैं जो ऐसी ‘नसीहतों’ से भरी पड़ी है। उदाहरण के लिए ‘नारी शिक्षा’ नामक पुस्तक में लिखा है- ‘स्त्री को बाल, युवा और वृद्धावस्था में जो स्वतंत्र न रहने के लिए कहा गया है, वह इसी दृष्टि से कि उसके शरीर का नैसर्गिक संघटन ही ऐसा है कि उसे सदा एक सावधान पहरेदार की जरूरत है। यह उसका पद-गौरव है, न कि पारतंत्र्य।’

मजेदार बात यह है कि इस प्रकार का साहित्य धड़ल्ले से बिक रहा है और ‘संस्कृति’ के पैरोकार इसकी पैरवी करते नहीं थकते। संविधान द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों का सीधा-सीधा उल्लंघन करने वाले इस तरह के साहित्य के इतनी मात्रा में बिकते रहने से किसी को कोई परेशानी नहीं हैं। दूसरी तरफ, इतिहास से लेकर वर्तमान तक ऐसे कई उदाहरण देखने को मिलते हैं जब उत्कृष्ट साहित्य के तौर पर देखी जाने वाली किसी किताब पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है या किसी किताब को विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम से भी हटवा दिया जाता है।

ऐसा सिर्फ इसलिए कि उस किताब में किसी खास घटना या संदर्भ को अनेक नजरिए से देखने की वकालत की जाती है, न कि मिथकों को ही इतिहास समझने पर बल दिया जाता है। सोचने वाली बात यह है कि इनमें से ज्यादा घातक कौन-सी पुस्तक है? जो आपको किसी घटना या मिथक के विभिन्न पहलुओं से रूबरू करवाए या वह जो आधी से अधिक जनसंख्या को अघोषित रूप से कुचलने या दमन करने के लिए इस प्रकार के मिथकों और ‘नैतिक शिक्षा’ की आड़ में गुलाम बनाए रखने को तरजीह देती हो!

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

 

Next Stories
1 सेवा में निवेश
2 कोहरे में सफर
3 अनुभव का रिश्ता
यह पढ़ा क्या?
X