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मुक्ति की राह

विकेश कुमार बडोला कई बार ऐसा लगता है कि देश का सामूहिक जीवन बहुत अधिक कुंठाओं का शिकार है। इसके बावजूद समझ-बूझ रखने वाले लोग अपने-अपने सामाजिक परिवेश को आशा और विश्वास बनाए रखने के लिए प्रेरित करते रहते हैं। कोई मनुष्य या समूह एक समाज के रूप में सहजता से जीवनयापन कैसे कर सकता […]

Author November 20, 2014 1:36 AM

विकेश कुमार बडोला

कई बार ऐसा लगता है कि देश का सामूहिक जीवन बहुत अधिक कुंठाओं का शिकार है। इसके बावजूद समझ-बूझ रखने वाले लोग अपने-अपने सामाजिक परिवेश को आशा और विश्वास बनाए रखने के लिए प्रेरित करते रहते हैं। कोई मनुष्य या समूह एक समाज के रूप में सहजता से जीवनयापन कैसे कर सकता है, जब उसके पास परंपरा और आधुनिकता के साथ सामंजस्य बनाए रखते हुए जीवन जीने की बाध्यता हो! इस कारण परंपरागत सामाजिक धर्म, उत्सव, त्योहार, खेल आदि जीवन संगतियां सामूहिक भाव-बहाव से संचालित न होकर व्यक्तिगत एकल भाव से परिचालित होने लगी हैं, जिसकी हानि अनेक सामाजिक विसंगतियों के रूप में हो रही है।

मसलन, धर्म एकांतिक आराधना था, अब वह सड़क पर लाउडस्पीकर के जरिए गाया-बजाया जाने वाला एक सामाजिक ध्वनि प्रदूषण बन गया है। त्योहार, जो सामाजिक संचेतना और ऊर्जा के वाहक थे, सबसे पहले व्यापारिक क्रियाओं के आधार बने और आज अपव्यय, अव्यवस्था के सबसे बड़े कारक बन गए हैं। खेल और क्रीड़ाएं कभी तन-मन को स्वस्थ रखने वाली गतिविधियां थीं, वे आज अवैध धन के लेन-देन को राजकीय प्रबंध के सहारे गति दे रही हैं।

वर्तमान में मनुष्य जीवन के रंजन के लिए निर्धारित उसकी हरेक पारंपरिक और सामाजिक संगति को व्यापार से जोड़ कर चलाया जा रहा है। व्यापार गलाकाट सामाजिक प्रतिस्पर्धा बढ़ा रहा है। व्यापार में उद्यमिता की कोई बात और विचार नहीं है। व्यापारिक भाग-दौड़ एक जनवर्ग के लिए अत्यधिक लाभ अर्जित करने का माध्यम भर बन गई। उपभोक्ता और व्यापारी बन कर मनुष्य वस्तुओं के बजाय खुद का भोगोपभोग करने पर लगा हुआ है। उसकी आत्मरुचि समाप्त हो गई और उसमें उपभोक्तावाद के परिणामस्वरूप गैरजरूरी महत्त्वाकांक्षाओं के विचार जड़ें जमाने लगे हैं। मनुष्य केवल दिमाग से ही किसी बात या विचार का विश्लेषण कर पा रहा है। इससे उसमें तनाव की अधिकता हो गई है। यह स्थिति शुरू होने का मतलब है मनुष्य का मनुष्यता से तीव्र विचलन। ऐसा होने पर जन-गण-मन की कल्याण भावना कैसे बनेगी! इसी कारण सामाजिकता, उद्यमिता और जनकल्याण के कार्य मनुष्य की आत्मरुचि से संगठित नहीं हो पा रहे। इन सबसे जीवन बाहर से तो चमक रहा है, पर अंदर से अंधेरों में लिपटा हुआ है।

जीवन अगर अंधेरा है तो उसमें उजाला लाने के लिए हमें दूसरा जीवन नहीं मिलने वाला। इसी तरह, अगर जीवन आशान्वित है, तो भी आशाओं के फल इस जीवन के आखिरी तक भी नहीं मिले, तब कैसा प्राकृतिक न्याय और कौन-सी जिंदगी या जैविक मौलिकता! शायद भगवान के प्रति भी इसी विचार-बिंदु से भ्रम-पोषित अविश्वास बढ़ने लगता है। भगवान के प्रति पूर्ण अविश्वास भी यह सोच कर नहीं होता कि हमें इतना तो मान-जान लेना ही चाहिए कि जीवन हमेशा नहीं रहेगा। इस रहस्य को जानने-समझने की चाह सभी मनुष्यों में कभी न कभी तो होती ही है कि आखिर मौत के बाद का खेला है क्या! बेशक जीवन के प्रति बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ाने के विचार से परिपक्व और प्रौढ़ जन उन्हें प्रसन्नता से जीवन गुजारने की सलाह देते रहे हैं। यह उनका कर्तव्य भी होता है। लेकिन वे भी अपने नितांत एकल जीवन-दर्शन में मृत्यु के विचार पर विचारहीन और भावविहीन होते हैं।

आज इस भाव से एकाकार होना संपूर्ण सामूहिक जीवन के लिए बहुत आवश्यक है। यही भावना वैश्विक उपभोक्तावादी दुष्प्रवृत्तियों पर नियंत्रण कर सकती है। दुनिया के अतिसंवेदनशील विद्वानों, लोगों ने समय-समय पर सबकी खुशहाली के लिए यही ‘मंत्र’ फूंका है। यह युवाओं की समझ में भी आ जाए तो संसार उपभोक्तावाद से बाहर निकल सकता है। अगर यह हो गया, तो जीवन सबसे सुंदर और अपेक्षित भावनाओं से सुसज्जित होगा।

 

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