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विद्वेष के बोल

अनुज दीप यादव पिछले छह महीने के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदुत्ववाद की पहचान रखने के साथ-साथ भारतीय जनता पार्टी के साधु दिखने वाले नेताओं ने सार्वजनिक सभाओं में जैसे बोल बोले हैं, वह यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि क्यों और कैसे देश की सोलहवीं लोकसभा में सत्तारूढ़ दल के सबसे […]

Author December 20, 2014 1:17 PM

अनुज दीप यादव

पिछले छह महीने के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदुत्ववाद की पहचान रखने के साथ-साथ भारतीय जनता पार्टी के साधु दिखने वाले नेताओं ने सार्वजनिक सभाओं में जैसे बोल बोले हैं, वह यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि क्यों और कैसे देश की सोलहवीं लोकसभा में सत्तारूढ़ दल के सबसे अधिक अट्ठानवे सांसद आपराधिक मामलों में नामजद हैं। योगी आदित्यनाथ का कथित ‘लव-जिहाद’ के खिलाफ अभियान, साक्षी महाराज का मदरसों को आतंकवाद का अड्डा बताना और साध्वी निरंजन ज्योति का हाल ही में दिया गया बेहद आपत्तिजनक बयान- सबने समय-समय पर अपनी भूमिका का ‘अच्छा’ निर्वहन करने का प्रयास किया। जब उपचुनाव आए तो कथित ‘लव-जिहाद’ और मदरसों पर बयानी हमले के जरिए मुसलिमों को निशाना बनाया गया और चुनाव को हिंदू-मुसलिम ध्रुवों के बीच बांटने की कोशिश की गई।

लेकिन उससे बड़ी भूमिका और दायित्व साध्वी ने निभाने की कोशिश की। जब देश में ‘विकास-पुरुष’ कहे जाने वाले नरेंद्र मोदी की सरकार के छह महीनों के कामकाज का निरीक्षण के साथ देश में प्रचारित ‘अच्छे दिनों’ की पड़ताल शुरू हुई और विपक्ष के अलावा मीडिया के एक हिस्से ने भी सरकार को घेरना शुरू किया, तब भाजपा के नेताओं ने लगातार विवादित बयान के जरिए मुद्दों को भटकाना शुरू कर दिया। इस माहौल में शायद साध्वी ने सोचा होगा कि मंत्री होकर भी अगर अपने विचार मुंह से न उगले तो किस बात की मंत्री! आखिर विचारों का जन्म अपने दिमाग में होता है तो जनता तक इन्हें पहुंचाने में क्या हर्ज! हैरानी इस बात पर भी हुई कि भाजपा के नेताओं अरुण जेटली और वेंकैया नायडू ने आपत्तजिनक बयान देने वाली मंत्री का बचाव किया।

गौरतलब है कि ऐसे राजनीतिक साधुओं में से कोई ‘कथावाचक’ है तो कोई ‘मठाधीश्वर’, जिन्होंने मुद्दों पर नहीं, जनता की भावनाओं को वोटों में बदल कर चुनाव जीते हैं। इतने पर भी ऐसे विवादित बयान जनतंत्र के लिए कितने खतरनाक हैं, इसका अंदाजा लगाना बहुत आसान है। सवाल है कि साध्वी निरंजन ज्योति के बयान का किस लिहाज से बचाव किया जा सकता है? जिन शब्दों का उपयोग उन्होंने किया, वह न तो ‘कथावाचक’ के मुंह से निकलने वाले कोई शब्द थे और न ही एक जिम्मेदार मंत्री के संवैधानिक भाषा के किसी भाषण के अंश। इन सबके बाद साध्वी के बचाव लिए उनकी जातिगत पृष्ठभूमि को मुद्दा बनाना भाजपा के बिहार और उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभाओं के लिए सोची-समझी ‘रणनीति’ लगती है, क्योंकि भाजपा के कुछ नेता इसी तरह के बिसात बिछाने में लगे हैं।साध्वी के नाम पर इन राज्यों में चुनावी गणित के जिन जातीय समीकरणों को साधने की तैयारी चल रही है, वह उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव के नए-नए बने ‘कुनबे’ के लिए जरूर मुसीबत बढ़ाने वाली है।

संघ और भाजपा को शायद साध्वी निरंजन ज्योति रूप में नई ‘उमा भारती’ मिल गई हैं जो उनके जैसी आक्रामक नेता के रूप स्थापित होने के लिए संघर्ष कर रही हैं। यही स्थिति रही तो शायद जल्दी ही वे परोक्ष तरीकों को छोड़ कर हाल के आपत्तिजनक बयान जैसी बातें करके सुनने वालों की प्रशंसा की पात्र बनने की तैयारी शुरू कर देंगी। इन सबके बीच पिछले छह महीनों के दौरान प्रधानंत्री मोदी के मना करने के बाद भी उनके सांसद और मंत्रियों ने जैसे बयान दिए हैं, वे न केवल प्रधानमंत्री मोदी की इच्छाशक्ति पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं, बल्कि भाजपा में चल रहे परदे के पीछे के खेल की तरफ भी इशारा करते हैं!

 

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