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सिमटता सुख

 प्रशांत कुमार किसी जमाने में कहा जाता था कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है। शहरों से नहीं, गांवों से इसकी हस्ती है। लेकिन प्रकृति की गोद में बसे गांवों की फिजा धीरे-धीरे बदलने लगी। शहरीकरण की ऐसी आंधी चली कि अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस शहरों ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। अच्छी […]

Author October 16, 2018 11:49 AM

 प्रशांत कुमार

किसी जमाने में कहा जाता था कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है। शहरों से नहीं, गांवों से इसकी हस्ती है। लेकिन प्रकृति की गोद में बसे गांवों की फिजा धीरे-धीरे बदलने लगी। शहरीकरण की ऐसी आंधी चली कि अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस शहरों ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। अच्छी शिक्षा के लिए भी युवा पीढ़ी ने शहर का रुख किया। लेकिन इसके बाद युवा पीढ़ी गांव से दूर होती चली गई। जिस गांव से उसकी सांस्कृतिक जड़ें जुड़ी थीं, उससे वह कटती चली गई। शहर की चकाचौंध में वह ऐसी खोई कि पीछे मुड़ कर देखने की फुर्सत नहीं रही। इस बीच गांवों में केवल वृद्ध बच गए। यह स्थिति लगभग सभी गांवों की है। अपनों के इंतजार में बाट जोहती आंखों में खुशियों के आंसू आते तो हैं, लेकिन साल में एकाध बार ही। बमुश्किल त्योहारों के मौसम में ही चंद दिनों के लिए रूठी खुशियां घर आती हैं और घर-आंगन महका कर फिर अपनों से विदा लेकर लौट जाती हैं। वृद्धाश्रम के बुजुर्गों को तो पता भी नहीं चलता कि कैसे खुशियों भरे दिन बीत गए।

कुछ समय पहले अपने गांव गया था। पहले की तरह चहल-पहल नहीं दिखी। कुछ स्कूल जाते बच्चे रास्ते में दिखे। अच्छा लगा, यह देख कर कि रफ्ता-रफ्ता ही सही, चीजें बदल रही हैं। सोचने लगा कि इस उम्र में मेरा समय शायद खेत-खलिहानों से लेकर गांवों की सड़कों को मापने में ज्यादा कटता था। खेतों से मूली-गाजर उखाड़ कर खाने का और खेत वाले को पकड़ने के लिए दौड़ता देख सिर पर पांव रख भागने का सुख ही कुछ और था। लेकिन अब गांवों में चौपाल नहीं लगती। शाम के वक्त दालानों पर टिमटिमाती ढिबरी का स्थान दूधिया रोशनी वाले सफेद बल्बों ने ले लिया है। कभी शाम होते ही बच्चों में दादी-नानी के किस्से सुनने की होड़ मचती थी।

इन कहानियों के जरिए नैतिक शिक्षा, चरित्र निर्माण की बातें बच्चों के दिमाग में डाली जाती थीं। मगर अब शहरों में शाम होते ही बच्चों की मस्ती की पाठशाला शुरू हो जाती है। टीवी पाठशाला में कई तरह के गुरुदेव उन्हें अंधविश्वास या हिंसा की शिक्षा देने हाजिर हो जाते हैं। इस दौरान इन नौनिहालों के दिमाग में मैगी, पिज्जा और बर्गर के जादुई विज्ञापन जरूरत की तरह बैठ जाते हैं। दरअसल, माता-पिता दोनों के कामकाजी होने की स्थिति में बच्चे न चाहते हुए भी टीवी को अपना अघोषित अभिभावक मान चुके हैं। शहरों में अधिकतर अभिभावक कामकाजी होने के कारण बच्चों पर ध्यान नहीं दे पाते। यहीं जरूरत महसूस होती है वृद्धाश्रम में भेज दिए गए बुजुर्गों की। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

इन्हीं हालात का फायदा उठाती हैं बहुराष्ट्रीय कंपनियां। इन नौनिहालों के रूप में केवल फायदे का सौदा करने वाली कंपनियों को सस्ता, सुलभ और लंबे समय तक उपभोक्ता बने रहने वाला समूह मिल जाता है। जाहिर है, यह सब सोची-समझी रणनीति के तहत अंजाम दिया जा रहा है, ताकि लोगों की निर्भरता बाजार पर बनी रहे। आज इन कंपनियों के मुख्य निशाने पर चौदह साल से कम उम्र के बच्चे हैं। कहते हैं, भूमंडलीकरण के इस युग में दुनिया सिमट रही है। लेकिन आज बाजार की गोद में पलने वाली पीढ़ी अपने घर के लोगों के अलावा अपने रिश्तेदारों को भी शायद ही पहचान पाती हो।

 

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