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शासन की नीति

नीरज प्रियदर्शी विश्व के इतिहास में ‘शासन की नीति’ की गूढ़ परिभाषाएं शासनाधीन व्यक्तियों के लिए बहुत हद तक अबूझ पहेली बनी हुई हैं। कैसे और किस प्रकार शासन होना चाहिए, यह किस पर निर्भर करता है? शासन करने वालों या शासित होने वालों पर? लोकतंत्र में इस बात पर जोर दिया गया है कि […]

नीरज प्रियदर्शी

विश्व के इतिहास में ‘शासन की नीति’ की गूढ़ परिभाषाएं शासनाधीन व्यक्तियों के लिए बहुत हद तक अबूझ पहेली बनी हुई हैं। कैसे और किस प्रकार शासन होना चाहिए, यह किस पर निर्भर करता है? शासन करने वालों या शासित होने वालों पर? लोकतंत्र में इस बात पर जोर दिया गया है कि शासित अपने शासक का चुनाव कर उसे यह अधिकार प्रदान करता है कि वह शासन की ऐसी प्रक्रिया लागू करे जो शासित के हितों की पूर्ति करती हो। अब शासक की अपनी जिम्मेदारी होती है और उससे अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन सही ढंग से करे। लोकतंत्र से इतर शासन की यह परिभाषा कोई मायने नहीं रखती। फिर तो आप बस शासन कीजिए, लेकिन कैसे और किसके लिए, यह शासक के व्यक्तित्व और उसके कर्मों पर निर्भर करता है।

परिभाषाएं और सिद्धांत आमतौर पर किताबों, भाषणों और शासक बनने की गुहार लगाने की कड़ी के रूप में ज्यादा सार्थक प्रतीत होते हैं। व्यवहार से इनका कितना नाता है, इतिहास इस बात का गवाह है। अब तो हम परिभाषाओं को भूलने लगे हैं और वे महज इतिहास को इंगित करने के लिए प्रयोग में लाई जाती हैं। क्या शासन की परिभाषा इतिहास को इंगित करती है? अभी तक क्या ऐसा शासन इतिहास में वर्णित है, जिसने शासन सिद्धांतों का पालन किया हो?

यक्ष प्रश्न यह है कि कौन और कैसे शासन की नीति का निर्धारण करेगा? क्या आम जनता (शासित) या फिर शासक? शासितों से क्या यह अपेक्षा की जा सकती है कि वे शासन की नीति का निर्धारण कर खुद उस नीति का अनुसरण करें? यह मुश्किल प्रतीत होता है। दैनंदिन कार्यों और आदतों से यह साफ झलकता है कि ऐसा बिरले ही कर पाते हैं। तो क्या अब शासक पर छोड़ देना चाहिए कि नीतियों का निर्माण कर वह खुद शासन करे? ऐसा करना शासित के लिए आत्मघाती हो सकता है। फिर तो शासक की मनमर्जी और शासित की सिसकियां ही देखने को मिलेंगी। पूरे विश्व में शासक और शासित के बीच ठन-सी गई है। मुद्दा केवल यही है कि ‘शासन की नीति’ क्या हो? रूस, चीन, फ्रांस और भारत इस मुद्दे पर आंदोलन, क्रांति और रक्तपात झेल चुके हैं। गांधी के स्वराज की संकल्पना से लेकर मार्क्स के सर्वहारा वर्ग और रूस की बोल्शेविक क्रांति इतिहास के पन्नों पर स्वर्णाक्षरों में अंकित हैं। जाहिर है, शासक और शासित के बीच यह लड़ाई प्रासंगिक तो है ही, यह भी सोचने को विवश करती है कि हम किसका पक्ष लें! हम शासक बनना चाहते हैं या शासित?

जरूरत है कि सामंजस्य स्थापित किया जाए। एक ऐसी व्यवस्था, जिसमें शासन की नीति के मायने शासक और शासित दोनों के लिए समान हों। शासक बनने की तमन्ना शासित के लिए तो होनी ही चाहिए, शासित बनने का कलेजा शासक को भी जुटाना पड़ेगा। नागार्जुन की कविता ‘शासन की बंदूक’ की ये पंक्तियां शासक और शासित के बीच के टकराव को स्पष्ट करती हैं- ‘खड़ी हो गई चांप कर कंकालों की हूक/ नभ में विपुल विराट-सी शासन की बंदूक/ सत्य स्वयं घायल हुआ, गई अहिंसा चूक/ जहां तहां दगने लगी शासन की बंदूक।’ ऐसा नहीं लगता कि यह टकराव आने वाले दिनों में खत्म होने वाला है। हमें इतिहास से सबक लेने की जरूरत है। बस ‘शासन की नीति’ का खयाल रखा जाए, ताकि कोई शोषित न हो।

 

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