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हादसे की कड़ियां

हेमंत कुमार जनसत्ता 7 अक्तूबर, 2014: पटना के गांधी मैदान में ‘रावण वध’ के बाद मची भगदड़ में तैंतीस लोगों की मौत की जिम्मेवारी मांझी सरकार के अलावा उन राजनीतिक दलों और मीडिया को भी लेनी चाहिए जो नीतीश राज के ‘सुशासन’ का श्रेय लूटने या उसका गुणगान करने में पीछे नहीं रहे, लेकिन अब […]

हेमंत कुमार

जनसत्ता 7 अक्तूबर, 2014: पटना के गांधी मैदान में ‘रावण वध’ के बाद मची भगदड़ में तैंतीस लोगों की मौत की जिम्मेवारी मांझी सरकार के अलावा उन राजनीतिक दलों और मीडिया को भी लेनी चाहिए जो नीतीश राज के ‘सुशासन’ का श्रेय लूटने या उसका गुणगान करने में पीछे नहीं रहे, लेकिन अब अपनी भूमिका से पल्ला झाड़ना चाहते हैं। जिन दिनों गांधी मैदान की किलेबंदी की जा रही थी, आपात स्थिति में आसानी से बाहर निकल सकने वाले घेरे को खत्म कर चारों ओर करीब दस फुट ऊंचा घेरा बनाया जा रहा था, नवनिर्माण के नाम पर करोड़ों रुपए के वारे-न्यारे हो रहे थे, तब सरकार की सहयोगी भाजपा, विपक्ष और यहां तक कि मीडिया भी चुप रहा। तब नीतीश कुमार की प्रशंसा में पुल बांधने वाले मीडिया को सजावट के नाम पर होने वाली लूट की खबर सामने लाना जरूरी नहीं लगा। निश्चित रूप से इस हादसे के लिए प्रशासन को जिम्मेदारी लेनी चाहिए। लेकिन अब भी यह पता लगाना चाहिए कि गांधी मैदान की साज-सज्जा की योजना किसकी थी और उसका ठेका जिसे मिला था, वह व्यक्ति या समूह किस पार्टी से जुड़ा है! लेकिन शायद ही कभी किसी निर्माण के ध्वस्त होने या उसकी वजह से हुए हादसे के बाद उसे बनाने वाले ठेकेदार, इंजीनियर और उसके ढांचे के बारे में कोई खोजपरक रिपोर्ट कहीं आती है।

इसके अलावा, पूजा के आयोजन की अनुमति और बिजली के कनेक्शन संबंधी नियम-कायदों के उल्लंघन या उस पर कोई कार्रवाई से संबंधित कितनी खबरें आर्इं? अगर किसी पूजा पंडाल में अचानक आग लगती और लोग मरते तो कौन जिम्मेवार होता? पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल (पीएमसीएच) परिसर में दुर्गा पूजा पंडाल के निर्माण और अस्पताल के गेट पर तेज आवाज में लाउडस्पीकर बजाने पर रोक का आदेश जारी हुआ था। मरीजों की परेशानी के मद्देनजर पूजा समितियों को हिदायत दी गई थी कि वे अस्पताल परिसर में पंडाल न लगाएं। बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने वहां के दो पंडालों को सर्वाधिक ध्वनि प्रदूषण वाला पंडाल माना था। पीएमसीएच परिसर को ध्वनि प्रदूषण से मुक्त रखा जाए, यह सुनिश्चित कराना जिला और अस्पताल प्रशासन की जिम्मेवारी है। लेकिन यह सुनिश्चित हो, इस बात की फिक्र किसी को नहीं थी। क्या इस काम के लिए नागरिक समाज को आगे नहीं आना चाहिए था? क्या वह दिन कभी आएगा, जब हम बिना कानूनी कार्रवाई के डर के खुद कानून का पालन करेंगे?

उत्सव और आस्था के नाम पर हमारा समाज वे सारे काम करता है, जिससे तमाम लोगों को परेशानी उठानी पड़ती है। लेकिन हम पर तब तक कोई असर नहीं पड़ता, जब तक कोई बड़ा हादसा पेश न आ जाए। कई बार हादसों के पहले या बाद मीडिया भी अपनी भूमिका ईमानदारी से नहीं निभाता। पिछले साल छपरा में जहर मिला मध्याह्न भोजन खाने से दो दर्जन बच्चों की मौत के बाद करीब एक महीने तक किसी चापाकल या कुएं में जहर डाले जाने की खबरें आती रही थीं। इन खबरों पर विपक्षी दल सरकार को घेरते थे और मीडिया उसे प्रमुखता से प्रकाशित-प्रसारित करता था। बाद में अपने आप ही यह भेद खुला कि कुछ लोग सुनियोजित तरीके से अफवाह फैला रहे थे। लेकिन मीडिया ने इन खबरों के पीछे झांकने की कोशिश नहीं की। किसी ने विरोधी दलों से यह नहीं पूछा कि बच्चों से जुड़े इस संवेदनशील मसले पर सारे दल एकजुट होकर गांवों में क्यों नहीं जा रहे! अफवाह फैलाने वालों को बेनकाब क्यों नहीं कर रहे!

दरअसल, यह प्रतिक्रियावाद से उपजी बीमारी है। समूह, समाज और राज सोचने-समझने के बजाय जब सिर्फ प्रतिक्रिया के बूते चलने पर उतारू हो जाए, तो हर कोई भीड़ का हिस्सा बनना चाहता है। नींद कुचलने के बाद टूटती है, बचाव की चिंता कुचल जाने के बाद होती है!

 

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