लापरवाही का रोग - Jansatta
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लापरवाही का रोग

अभय कुमार सिंह जनसत्ता 13 नवंबर, 2014: मानसून अब आकर गुजर चुका है। एक तरफ इसका आगमन देश के लिए सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, तो आमतौर पर जून में इसके शुरू होने के साथ ही बिहार और उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में इंसेफेलाइटिस, यानी जापानी बुखार से होने […]

Author November 13, 2014 11:45 AM

अभय कुमार सिंह

जनसत्ता 13 नवंबर, 2014: मानसून अब आकर गुजर चुका है। एक तरफ इसका आगमन देश के लिए सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, तो आमतौर पर जून में इसके शुरू होने के साथ ही बिहार और उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में इंसेफेलाइटिस, यानी जापानी बुखार से होने वाली मौतों का सिलसिला भी शुरू हो जाता है। इस साल भी इस बीमारी का कहर जारी रहा और लगभग चौदह सौ लोग इंसेफेलाइटिस से अपनी जान गवां चुके हैं। गौरतलब है कि जापानी बुखार पंद्रह वर्ष से कम उम्र के बच्चों को ज्यादा प्रभावित करता है। सन 1978 से ही पूर्वांचल में जापानी बुखार से मौतें होती आ रही हैं।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अब तक लगभग तेरह हजार बच्चे इस बीमारी की चपेट में आकर काल-कवलित हो चुके हैं और करीब इतने ही शारीरिक और मानसिक रूप से अपंग हो चुके हैं। इनकी सुध किसी को नहीं हैं। सवाल है कि आखिर ऐसी स्थिति का जिम्मेदार कौन है? 1958 में ही इस बीमारी के टीके की खोज हो चुकी थी। लेकिन हमारी सरकार ने संवेदनहीनता की पराकाष्ठा दिखाते हुए 2006 में इस टीके का आयात जापान से किया। तब तक हजारों मांओं की गोद सूनी हो चुकी थी। पूर्वांचल जैसे तराई क्षेत्र में मच्छरों के प्रकोप, सूअर-बाडेÞ का अव्यवस्थित प्रबंध और स्वच्छ पानी के अभाव के कारण साल-दर-साल यह बीमारी फैलती ही जा रही है। यों जून से अक्तूबर तक जापानी बुखार का प्रकोप ज्यादा रहता है, लेकिन चिकित्सालयों में साल भर इसके मरीज आते रहते हैं।

इसके मद्देनजर चिकित्सा सुविधाओं की बात करें तो पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक ही मेडिकल कॉलेज है, जिसमें कथित तौर पर सुविधाएं मुहैया कराई गई हैं। लेकिन वास्तव में पूरा बीआरडी मेडिकल कॉलेज तमाम वित्तीय और तकनीकी अभावों से जूझ रहा है। जून से अक्तूबर के महीने में यहां तीन राज्यों और आसपास के जिले समेत कई इलाकों से हजारों की संख्या में मरीज आतें हैं, लेकिन कभी बिस्तर तो कभी वेंटीलेटर की कमी से मरीजों के परिजन जूझते दिखाई पड़ते हैं। नतीजतन, जिन बच्चों की जान बचाई जा सकती है, उनकी जान भी चली जाती है।

जापानी ज्वर का विषाणु ‘क्यूलेक्स विश्नोई’ नाम के मच्छरों से मनुष्यों में फैलता है। यह विषाणु सूअरों में पनपता है। इसलिए बीमारी की रोकथाम के लिए सबसे बड़ी जरूरत है साफ-सफाई और जागरूकता की। देश का मीडिया इस बीमारी के खिलाफ लड़Þाई में मददगार की भूमिका निभा सकता है। लेकिन इतनी मौतें हो जाने के बाद भी राष्ट्रीय समाचार पत्रों ने इस बीमारी को लेकर कोई खास रुचि नहीं दिखाई है। देश की राजधानी में ही बहुत कम लोग ऐसे हैं, जिन्हें यह पता है कि जापानी ज्वर एक गंभीर और जानलेवा बीमारी है और देश के कई राज्य इस बीमारी के प्रकोप से जूझ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से इसकी रोकथाम के मद्देनजर गोरखपुर में ‘एम्स’ बनाने की मांग चल रही है। लेकिन सरकार ने अब भी कोई कारगर कदम नहीं उठाया है। सवाल है कि क्या सरकार अभी कुछ और मौतों का इंतजार कर रही है!

 

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