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सहजता का जीवन

अनुपमा झा जनसत्ता 24 सितंबर, 2014: अखबार, टीवी, पत्रिकाएं, पार्क, ड्राइंगरूम और यहां तक कि बेडरूम में भी कथित ‘लव-जिहाद’ जैसी घटनाओं की खबरें और हिंदू, मुसलिम, ईसाई, दलित आदि के बीच के अंतर और पनप रही या पनपाई जा रही हिंसा और घृणा की चर्चा लोगों की बातचीत का हिस्सा बनती जा रही है। […]

Author September 24, 2014 12:46 PM

अनुपमा झा

जनसत्ता 24 सितंबर, 2014: अखबार, टीवी, पत्रिकाएं, पार्क, ड्राइंगरूम और यहां तक कि बेडरूम में भी कथित ‘लव-जिहाद’ जैसी घटनाओं की खबरें और हिंदू, मुसलिम, ईसाई, दलित आदि के बीच के अंतर और पनप रही या पनपाई जा रही हिंसा और घृणा की चर्चा लोगों की बातचीत का हिस्सा बनती जा रही है। लेकिन इस मसले पर जितनी भी बातचीत और उत्तेजनाएं देखी जा रही हैं, वे कुछ ठीक करती नजर नहीं आतीं। बल्कि हम सबके बीच की दूरियां हमारे शिक्षित होने के साथ शायद और भी बढ़ती जा रही हैं। जबकि आज जिस तरह का दौर आ गया लगता है, उसमें यह समझना मुश्किल हो रहा है कि इंसानियत को बचाने के लिए क्या किया जाए! आखिर वह कौन-सा उपाय है जो इस बढ़ती दूरी को कम कर पाएगा? ये दलीलें और संवाद तो उस समूह के लिए हैं, जिसके पास अपने विचार को सुदृढ़ करने के लिए अपने तर्क हैं। ऐसे में कभी-कभी सोचती हूं कि मेरे दायरे में कुछ लोग तो हैं जो इन सब मुद््दों में शिरकत नहीं करते… न ही उस तरह का कोई राजनीतिक झुकाव है। हमें अलग-अलग जाति या वर्ग के लोग बुनियादी रूप से अलग क्यों नहीं लगते। जबकि ऐसा माना जाता है, अगर आपकी राजनीतिक समझ नहीं है तो लोगों के बीच एक खास तरह की दूरी बनाए रखेंगे।

मुझे अपने बचपन के दिन याद हैं, जब हम तीन भाई-बहन हर बच्चे की तरह शायद इस अंतर को न तो जानते थे और न ही मानते थे। बाबूजी के दोस्तों और विद्यार्थियों में शुक्ल चाचा या रेहान चाचा, किश्वर बाजी हो या रेनू दीदी, हमें कभी उनके बीच कोई फर्क नहीं महसूस हुआ। न हमारे प्रति उनके व्यवहार में और न ही हमारे घर के वातावरण में। भाइयों के दोस्तों में जैसे कृष्ण मोहन भैया, वैसे ही अच्छे मियां। वहीं छोटे भैया के दोस्त राजू हों या फारूख़, घर में आकर खाए-पिए बिना जाएंगे नहीं। मेरी दोस्तों में सुधा हो या अंजुम, किसी को भी मेरे घर आने की मनाही नहीं थी। स्कूल में भी नरगिस, फातिमा, कैसर, पुष्पा या अनुपमा, हम सब एक साथ गोलगप्पे और झाल-मुढ़ी खाते थे। आपस में गुटबंदी भी करते, लेकिन गुट बनाने में सिर्फ एक चीज का ध्यान रखा जाता था कि कौन एक जैसी गतिविधियों में साथ रहता है। घर पर हरिचरन की नानी या राधिका की मां के, जो दोनों मेरे घर में काम करती थीं, चाय पीने के लिए अलग प्याली नहीं होती थी। अम्मी को किसी काम करने वाली से कभी भी हिकारत भरे शब्दों में बात करते नहीं सुना। हमें हरिचरन, सुधा किसी के साथ खेलने से न तो रोका गया, न ही यह बताया गया कि उनके गरीब या दूसरी जाति या वर्ग के होने के कारण उनसे हमें भेदभाव करना चाहिए। इसलिए शायद हम जैसों के नजरिये में वह अंतर नहीं पनप नहीं सका, बहुत सहज रहे हम। हमारे अपनी मां को ‘अम्मी’ बुलाने के पीछे ‘मुसलिम समुदाय’ का कोई असर नहीं था, बल्कि ‘मां’ और ‘मम्मी’ शब्द के बीच का संबोधन था वह।

आज भी बस एक ही खयाल आता है कि क्या हम सीख सकते हैं इस सहजता से जीना, जहां सजग होने के नाते हम भेदभाव नहीं करने का दावा करते न पाए जाएं, बल्कि भेदभाव करना चाहिए या नहीं, इसके बारे में हमने कभी सोचा ही न हो!

 

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