Editorial: Nafrat Ki Rah - Jansatta
ताज़ा खबर
 

नफरत की राह

राजीव यादव अगर हम ‘हेट स्पीच’, यानी नफरत के बोल की शिकायतों का अध्ययन करें तो वे ज्यादातर अल्यपसंख्यक या फिर मुसलिम विरोधी होती हैं। कुछ समय पहले चुनावों के दौरान ‘लव जिहाद’ और धर्मांतरण जैसे मुद्दों की बाढ़ आ गई थी। अब वे थम गई लगती हैं। सवाल है कि समाज में जिन कथित […]

Author December 1, 2014 11:48 AM

राजीव यादव

अगर हम ‘हेट स्पीच’, यानी नफरत के बोल की शिकायतों का अध्ययन करें तो वे ज्यादातर अल्यपसंख्यक या फिर मुसलिम विरोधी होती हैं। कुछ समय पहले चुनावों के दौरान ‘लव जिहाद’ और धर्मांतरण जैसे मुद्दों की बाढ़ आ गई थी। अब वे थम गई लगती हैं। सवाल है कि समाज में जिन कथित ‘लव जिहादियों’ की बात की जा रही थी, वे अचानक कहां चले गए? मुजफ्फरनगर में पिछले साल अगस्त-सितंबर में इसी मुद्दे के इर्द-गिर्द सांप्रदायिक तनाव का पूरा खाका रचा गया था।

दरअसल, हमारे समाज का पूरा ढांचा सामंती और पुरुषवादी सत्ता के सांचे पर गढ़ा गया है। उसमें वे सभी तत्त्व निहित हैं जो आज किसी भी फासीवादी राजनीति की जरूरत होती है। मतलब कि हमारे समाज की पूरी बुनावट और उसे उद्वेलित करने वाली राजनीति एक दूसरे का इस्तेमाल करती है। जो लोग इस बात का आरोप लगा रहे थे कि मुसलिम समाज के लड़के हिंदू समाज की लड़की को प्रेम में फंसा कर धर्मांतरण और विवाह करते हैं, उनके परिवारों में भी प्रेम और विवाहों की स्थिति का आकलन किया जाना चाहिए। कहीं ऐसा तो नहीं है कि समाज का सामंती ढांचा एक तीर से दो निशाने कर रहा है।

दरअसल, समाज में लड़की के साथ हुई हिंसा को अपनी जाति या समुदाय के साथ हिंसा होना माना जाता है। अगर इसी बीच कहीं से यह बात सामने आ जाए कि लड़की के किसी के साथ प्रेम संबंध थे, तो विरोध के स्वर धीमे हो जाते हैं। पिछले दिनों अमानीगंज, फैजाबाद में हुई घटना में ‘लव जिहाद’ का वितंडा मचाया गया। पर जैसे ही यह बात साफ हुई कि लड़की और लड़का बहुत दिनों से एक दूसरे को न सिर्फ जानते थे, बल्कि उनके बीच प्रेम-संबंध भी था, मामला शांत हो गया। ‘ये तो होना ही था’ मानने वाला समाज ‘ऐसी लड़की’ से कोई रिश्ता नहीं रखना चाहता है। यानी कि समाज लड़की के साथ हुई हिंसा के खिलाफ नहीं खड़ा हुआ था, वह किसी खास जाति या समुदाय के विरुद्ध खड़ा हुआ था। जाहिर है, लड़के-लड़कियों को लेकर हो रहे तनाव के लिए फासीवादी राजनीति के साथ-साथ हमारा समाज भी सह-अभियुक्त है, जो अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए ऐसे अवसरों की तलाश करता है।

कुछ समय पहले भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ का आजमगढ़ जिले में 2008 उपचुनाव के दौरान दिए गए उस वीडियो के अंश सामने आने के बाद खासी चर्चा हुई। इसमें वे एक हिंदू लड़की के बदले सौ मुसलिम लड़कियों को हिंदू बनाने की बात कर रहे थे। वृत्तचित्र ‘सैफ्रन वार’ के इस वीडियो फुटेज को आजमगढ़ जिला प्रशासन ने कहा था कि ऐसा कोई भाषण आदित्यनाथ ने नहीं दिया। उसे आदित्यनाथ ने न सिर्फ अपना माना, बल्कि उसे सही ठहराने की भी कोशिश की। सवाल है कि अगर उस वीडियो फुटेज में कुछ आपत्तिजनक नहीं था तो उस पर क्यों बहस हो रही थी? आदित्यनाथ को बचाने के लिए प्रशासन ने क्यों ऐसा कहा? वहीं आदित्यनाथ एक कदम आगे बढ़ कर सार्वजनिक रूप से और अधिक आक्रामक हुए। आखिर यह हौसला उन्हें कहां से मिला? इसके लिए सिर्फ चुनाव आचार संहिता के दरमियान उन्हें दी गई चुनावी छूट ही नहीं जिम्मेदार थी, बल्कि समाज की आचार संहिता की छूट की भी आपराधिक भूमिका थी। आज इसीलिए कहा जाता है कि सांप्रदायिकता के सवाल को मत उठाइए, क्योंकि इससे सांप्रदायिक ताकतों को ही लाभ मिल जाएगा। ऐसा शायद इसलिए कि हमारे समाज में सांप्रदायिकता निहित है, जो किसी एक चिंगारी की बाट जोहती है।

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App