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सृजन के सरोकार

सुनील मिश्र जनसत्ता 12 नवंबर, 2014: कला और मनोरंजन का संसार अनूठा है। इस संसार में उत्कृष्टता और श्रेष्ठता की चुनौतियां सर्जक और सृजन दोनों स्तरों पर निरंतर बनी रहती हैं। किसी समय यह मापदंड दोनों स्तरों पर लीक से हट कर और आकृष्ट करने की स्थिति तक अक्सर उदाहरण बनता था। इस यथार्थ को […]

Author November 12, 2014 1:28 PM

सुनील मिश्र

जनसत्ता 12 नवंबर, 2014: कला और मनोरंजन का संसार अनूठा है। इस संसार में उत्कृष्टता और श्रेष्ठता की चुनौतियां सर्जक और सृजन दोनों स्तरों पर निरंतर बनी रहती हैं। किसी समय यह मापदंड दोनों स्तरों पर लीक से हट कर और आकृष्ट करने की स्थिति तक अक्सर उदाहरण बनता था। इस यथार्थ को स्थापित होने में लंबा समय लगा और शीर्ष पर पहुंच कर वैकल्पिक धरातलों या सरलतम सृजन मार्ग पर फिर एक लोकप्रिय जगत को सिरजना उस मूल भाव के विपरीत व्यापक हुआ, जिसकी साधना या सरोकार अक्षुण्ण रहे। हमारे सामने दूसरी परंपरा का आना और उसमें एक बड़े जिज्ञासु समाज का समरस होना एक दूसरी घटना थी, जिसने अच्छे मिथकों को भी चुनौती दी। सर्जना के मूलभूत तत्त्व ही दूसरी परंपरा का माध्यम बने। वे औजार, जिन्हें मनुष्यता ने खुद गढ़ा था, आगे चल कर दूसरे औजारों से पिछड़ गए। सर्जना श्रेष्ठता के अपने मानक धरातल पर ही विभाजित होने लगी। देखते-देखते एक समांतर स्थान विकसित हो गया, यहां की प्रतिस्थापनाएं ज्यादा चकाचौंध भरी नजर आने लगीं। हमारे सामने श्रेष्ठजनों को आदरणीय का स्थान प्राप्त हो गया और उनका चरण स्पर्श भर करके हमने उनको उतने ही तक सीमित कर दिया। यह एक लंबी बहस का विषय हो सकता है कि जो ऊष्मा समूचे परिवेश को तांबई आभा दिया करती थी, जो ताप हमने बड़ी दूर रह कर भी अपने व्यक्तित्व में अनुभूत किया, उसी के बरक्स हमने आधुनिक धारा का एक और दौर अस्तित्व में आते देखा, जिसकी सीमाओं ने स्वर्णिम दौर को बने रहने दिया, लेकिन उसे सीमित भी कर दिया।

केतन मेहता की ‘रंगरसिया’ प्रदर्शन के परिणाम तक पहुंच सकती थी, इसका अनुमान नहीं था, क्योंकि वे इसे पांच साल पहले बना चुके थे। वे पिछली सदी के आठवें दशक के एक महत्त्वपूर्ण फिल्मकार हैं, जिनकी दृष्टि पर भरोसा किया जा सकता है, क्योंकि बाद के भटकाव को छोड़ कर उनके शुरू के सभी काम अच्छे थे। श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, सईद मिर्जा, प्रकाश झा और सुधीर मिश्र के कामों के बीच उनकी चर्चा होती थी। ‘जी’ चैनल पर उनका धारावाहिक ‘प्रधानमंत्री’ ध्यान में आता है, जो शायद ‘चाचा चौधरी’ के बाद उनका आखिरी अच्छा प्रयोग था। लेकिन जब राजा रवि वर्मा जैसे व्यक्तित्व के साथ उन्होंने अपनी नई फिल्म की कल्पना प्रस्तुत की, तो लगा कि वे हताशा के गहरे दौर में भी अपनी रचनाधर्मिता की ताप बचाए हुए हैं। ‘रंगरसिया’ बना चुकने के बाद केतन को इतने लंबे समय में कई बार यह लगा होगा कि शायद इसका प्रदर्शन न हो पाए। बहरहाल, करोड़ों के क्लब में दौड़-फांद कर जा पहुंचने के इस अजीबोगरीब समय में ‘रंगरसिया’ को कुछ हजार संजीदा दर्शक देखते हैं तो भी यह बड़ी बात होगी। भारतीय कला-परंपरा में राजा रवि वर्मा का व्यक्तित्व और कृतित्व अपनी जगह महान है। महान लोगों पर काम करना उत्साह और चुनौती के साथ संवेदनशील भी होता है।

यह जरूर हैरानी की बात है कि इस फिल्म का प्रचार-प्रसार जन-आकर्षण की दूसरी जिज्ञासाओं के साथ हुआ। मसलन, रचनात्मक रूप से एक बड़े कलाकार पर फिल्म बनाते हुए पूरे विषय को किस तरह बरता गया है, कैसे राजा रवि वर्मा के सृजनात्मक जीवन और जगत में सजगता और दक्षता के साथ प्रवेश किया गया है! गंभीर दर्शकों के लिए यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि ‘भवनी भवई’ और ‘मिर्च मसाला’ वाले केतन मेहता सिने-सर्जक के मूलभूत कला-कौशल पर अब भी कितना स्थिर हैं, कितना डिग चले हैं!

 

 

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