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आभासी दोस्ती

नवीन नेगी जनसत्ता 18 सितंबर, 2014: एक दिन में मेरी मित्र सूची में पंद्रह नए लोग शामिल हुए। कुछ मेरे शहर से थे, कुछ स्कूल या कॉलेज से। दो-तीन से तो मेरा दूर तक का रिश्ता नहीं था। हां, मैं ‘फेसबुक’ की मित्र-सूची की बात कर रहा हूं, जहां हर रोज कुछ पुराने दोस्त दोबारा […]

Author September 18, 2014 12:21 PM

नवीन नेगी

जनसत्ता 18 सितंबर, 2014: एक दिन में मेरी मित्र सूची में पंद्रह नए लोग शामिल हुए। कुछ मेरे शहर से थे, कुछ स्कूल या कॉलेज से। दो-तीन से तो मेरा दूर तक का रिश्ता नहीं था। हां, मैं ‘फेसबुक’ की मित्र-सूची की बात कर रहा हूं, जहां हर रोज कुछ पुराने दोस्त दोबारा मिलते हैं, तो कुछ अनजान लोग नए दोस्त बन जाते हैं। यह दोस्ती कितने समय तक कायम रहेगी, कितना साथ निभाएगी, दोस्ती के पैमानों पर खरी उतरेगी या नहीं, हम नहीं जानते। फिर भी आजकल किसी से पहली या दूसरी मुलाकात होते ही हम उसके फेसबुक पर दोस्त पहले बन जाते हैं, वास्तविक जिंदगी में भले कभी दोस्ती के नाम पर दोबारा किसी को याद भी करें या नहीं। फेसबुक पर होने वाली यह दोस्ती आजकल इतनी अहम हो गई है कि अगर हम अपने किसी खास दोस्त के फेसबुक मित्र नहीं हैं तो समझा जाता है कि हमारे बीच अवश्य कोई अनबन है या फिर हमारे रिश्ते में खटास पैदा हो गई है। साथ ही इस दोस्ती ने अपने कुछ नए पैमाने गढ़ लिए हैं। मसलन, अपने मित्र के हरेक फोटो को ‘लाइक’ करना, उसके हर पोस्ट पर ‘कमेंट’ करना और अपने पोस्ट को उसके साथ ‘टैग’ करना इसकी अनिवार्यता हो गई है।

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दोस्ती कराने तक तो सब सही है, यह पुराने बिछड़े यारों को भी मिलाता है। एक दूसरे के साथ अपने पल साझा करने का अवसर प्रदान करता है। लेकिन यहां ‘अनफ्रेंड’ नामक छोटा-सा ‘क्लिक’ काफी है किसी दोस्ती को पल भर में खत्म करने के लिए। यह न तो दोस्ती की गहराई को समझता है, न दोस्ती के लम्हों को जानता है और न ही दोस्ती खत्म होने के मर्म को। पहले कोई व्यक्ति दोस्ती को तोड़ने के लिए हजार बार सोचता था, हर पहलू को जांचता-परखता था और मुश्किल हालात होने पर ही बहुत हिम्मत जुटा कर किसी दोस्ती को खत्म करने का निर्णय करता था। साथ ही उन तमाम कारणों पर भी सोच लेता था, जिनकी वजह से वह उस दोस्ती को खत्म करने जा रहा है। वहीं इस फेसबुकिया दुनिया ने इन तमाम चरणों को समाप्त कर दिया है। जब चाहे आप एक बटन दबाते ही किसी खूबसूरत रिश्ते को खत्म कर सकते हैं। यह ठीक उस रिमोट कंट्रोल बम की तरह काम करता है, जो एक बटन दबाने के साथ ही बिना किसी संवेदना के हजारों लोगों की जिंदगी लील जाता है।

संवेदनाओं में आती कमी और रिश्तों का कम होता महत्त्व दर्शाता है कि आज हम जितनी तेजी से किसी से घुलमिल जाते हैं, उतनी ही तेजी से दूर भी हो जाते हैं। फेसबुक पर होने वाली दोस्ती जिस प्रकार नए मित्र को जोड़ने से पहले कोई सवाल नहीं पूछती, उसी प्रकार रिश्ते को खत्म करने के लिए भी किसी प्रक्रिया का निर्धारण नहीं मांगती। सवाल है कि फेसबुक पर एक क्लिक करने भर से क्या दोस्ती की वे सारी सीमाएं भी खत्म हो जाती हैं, जो उस रिश्ते की मिठास थी? यह सोचना मानव मस्तिष्क पर निर्भर करता है। आखिर फेसबुक एक मशीनी सेवा है, जो मानवीय संवेदनाओं से कोसों दूर है। लेकिन हमारी संवेदनाएं तो जीवित हैं। इसलिए किसी को भी ‘अनफ्रेंड’ करने से पहले दोस्ती के मायनों पर एक बार जरूर गौर कर लेना चाहिए।

 

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