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रोजगार की शिक्षा

नंदराम प्रजापति डॉ अब्दुल कलाम ने अपनी एक किताब में लिखा है कि जब बचपन में गणित से संबंधित एक सवाल कक्षा में किसी को समझ में नहीं आ रहा था, तब उनके अध्यापक सारी कक्षा को समुद्र के किनारे ले गए थे और फिर उन्होंने पक्षियों की उड़ान का उदाहरण देकर वह सवाल समझाया […]

Author December 9, 2014 12:02 PM

नंदराम प्रजापति

डॉ अब्दुल कलाम ने अपनी एक किताब में लिखा है कि जब बचपन में गणित से संबंधित एक सवाल कक्षा में किसी को समझ में नहीं आ रहा था, तब उनके अध्यापक सारी कक्षा को समुद्र के किनारे ले गए थे और फिर उन्होंने पक्षियों की उड़ान का उदाहरण देकर वह सवाल समझाया था। डॉ कलाम और उस कक्षा को वह सवाल और उसका जवाब समझ में आ गया था। लेकिन क्या आज हमें ऐसे कठिन सवाल समझ में आते हैं? वजह साफ है। जहां देखिए, किताबी ज्ञान के आधार पर हमें हर चीज को समझाने की कोशिश होती है। जबकि कुछ सवाल ऐसे होते हैं जो हम व्यावहारिकता के आधार पर ज्यादा समझते हैं। यही कारण होता है कि हमारी शिक्षा पद्धति विश्व शिक्षा के परिदृश्य में अपना स्थान नहीं बना पाती और राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी कहते हैं कि हमारा एक भी विश्वविद्यालय दुनिया के दो सौ विश्वविद्यालयों में नहीं हैं तो क्यों! क्या हमारे यहां पढ़ाने वाले काबिल शिक्षक नहीं हैं? शिक्षक हैं, पर हम हर सवाल को किताबी नजरिए से देखते हैं और पढ़ने को नंबर से आंकते हैं कि चलो पढ़ लिया जाए, परीक्षा में अच्छे नंबर आ जाएंगे?

इसमें होता यह है कि हम परीक्षा में तो अच्छा नंबर ले आते हैं, पर बहुत जल्द ज्यादातर पढ़ा-लिखा भूल जाते हैं। दरअसल, हम सवालों को समझने की कोशिश नहीं करते, बल्कि किसी भी तरह उसे रट कर याद करते हैं और परीक्षा दे आते हैं। इसी तरह से परीक्षा देने वाले विद्यार्थी बाद में अध्यापक बनते हैं और हमारी शिक्षा व्यवस्था ऐसे ही चलती रहती है। फिलहाल हो यह रहा है कि हमने अध्यापकों के लिए एक मानक तय कर दिया है। मसलन, प्राइमरी स्कूल में पढ़ाने के लिए बीटीसी या बीएड जैसी डिग्री, कॉलेजों में पढ़ाने के लिए नेट की परीक्षा तो कम से कम अनिवार्य ही है। अगर पीएचडी हो तो वह सर्वज्ञान संपन्न है। यही मानक है! इसमें भी यह कि जब अध्यापक की भर्ती होती है तो उसमें परीक्षा के स्थान पर ‘मेरिट’ अनिवार्य रहती है जो उसकी जीवन भर की पढ़ाई के नंबरों पर आधारित रहती है। इसमें होता यह है कि ज्यादा नंबर वाले अध्यापक पार हो जाते हैं और कम नंबर वाले रह जाते हैं और फिर यही शिक्षा पद्धति चलती है।

उसी किताब में डॉ कलाम ने आगे लिखा है कि हमें अपनी शिक्षा व्यवस्था को ऐसा बनाना होगा जो हर चेहरे पर म्२ोुस्कान ला सके। उनके चेहरे पर मुस्कान से आशय विद्यार्थियों को रोजगारपरक शिक्षा से था। पर क्या आज यह मुस्कान भारतीय शिक्षा व्यवस्था में है? शायद नहीं है। आज हमें अपनी शिक्षा व्यवस्था को एक कमरे की चारदिवारी से बाहर निकालना होगा और खुले आसमान में शिक्षा को लाना होगा। तब शिक्षा रोजगारपरक बन पाएगी। नहीं तो अच्छे नंबर लाकर अध्यापक की नौकरी में तो आगे हो जाएंगे, पर आने वाले विद्यार्थियों को रोजगारपरक शिक्षा नहीं दे पाएंगे। आज के बच्चे ही कल का भविष्य होते हैं और जैसा उनका बचपन होगा वैसा ही भविष्य। आज चीन या जापान में तकनीकी चीजें ज्यादा हैं और रोजगार का प्रतिशत भी। दरअसल, वहां की शिक्षा को रोजगारपरक बनाया गया है।

 

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