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पराधीन लड़कियां

मुहम्मद नवेद अशरफ़ी जनसत्ता 22 सितंबर, 2014: लगभग चौबीस साल की एक पढ़ी-लिखी, नौजवान और सुशील स्त्री को उसके पति ने तलाक दे दिया। उसकी शादी हुए महज एक साल हुए थे। गोद में मासूम बच्ची। यह एक घटना है, जो किसी तरह मेरी निगाह में आई। हालांकि पूरा देश इस तरह के नासूरों से […]

Author September 23, 2014 9:20 AM

मुहम्मद नवेद अशरफ़ी

जनसत्ता 22 सितंबर, 2014: लगभग चौबीस साल की एक पढ़ी-लिखी, नौजवान और सुशील स्त्री को उसके पति ने तलाक दे दिया। उसकी शादी हुए महज एक साल हुए थे। गोद में मासूम बच्ची। यह एक घटना है, जो किसी तरह मेरी निगाह में आई। हालांकि पूरा देश इस तरह के नासूरों से त्रस्त है। किसी भी स्त्री को जब इस दौर से गुजरना पड़ता है, तो उस पर दुखों के पहाड़ टूट पड़ते हैं, तमाम सवाल सामने खड़े हो जाते हैं, जो उसे सोने या जीने नहीं देते। दरअसल, एक जड़ परंपराओं के बीच जीने वाला समाज ही एक तलाकशुदा स्त्री को इस तरह की बातें सोचने पर मजबूर करता है कि ‘अब मुझे कौन अपनाएगा!’ मेरा मानना है कि अगर किसी स्त्री के मन में ऐसे सवाल कौंधते हैं, तो समझ लीजिए कि हमारा समाज अपाहिज है। भारतीय संस्कृति के नाम पर सदियों का जो अर्जित आख्यान है, वह एक छलावा है।

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आए दिन की घटनाएं कई बार यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या हमारा समाज स्त्री को इसलिए पैदा करता है कि वह कल को ‘निर्भया’ की तरह शिकार बनाई जाए, किसी खाप के फरमान पर झूठी इज्जत के लिए मार डाली जाए या फिर उसे सोनी सोरी बना कर असहनीय यातना दी जाए? दूसरी तरफ, पश्चिम ने सिखाया है कि किस तरह स्त्री को पूंजीवादी व्यवस्था में बाजार के मुनाफे के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। पश्चिमी दुनिया को महिला का सशक्तीकरण आधुनिक फैशन में नजर आता है तो हमारा समाज चूड़ी-कंगन, परदे-बुर्के में ही अटका हुआ है। इसके अलावा, भंवरी देवी, निर्भया, इशरत जहां, इमराना- इंसाफ की आस में गुजर चुकी या मुंतजिर महिलाएं नारीवादी आंदोलनों के सामने एक चुनौती के रूप में खड़ी हैं।
बेशक हमारा राजनीतिक ढांचा सौभाग्य से लोकतांत्रिक है! संसद देश का सर्वोच्च मंदिर है। महिलाओं की दशा को लेकर संसद में विमर्श होता है और इस पर मंथन या बहस करने में पुरुष ही हावी रहते हैं। विडंबना यह है कि राजनीतिक रूप से मुखर कुछ महिलाओं को भी पुरुष-व्यवस्था की जुबान बोलते देखा जाता है। जाहिर है, वह अपनी सत्ता और उसमें अपने लिए बेहतर मौके बनाए रखने के मकसद से होता है। लेकिन इससे एक व्यापक स्त्री आंदोलन को कितना नुकसान पहुंचता है, इसका खयाल शायद उन्हें नहीं होता। ऐसे में अगर देश की बेटियां घरों में मार डाली जाती हैं या खाप के फैसलों का निशाना बन रही हैं तो इसमें हैरानी की क्या बात है।

आज की दुनिया में ‘धर्म’ एक ऐसे शब्द के रूप में जाना जाता है जिसकी व्याख्या दुनिया के अनेक विद्वानों ने अलग-अलग तरीके से की है। नतीजतन, इस संसार को वह नहीं मिल पाया, जिसकी इसे जरूरत थी। महिलाओं के मामले में यहां सबसे भयंकर नजारे देखने को मिलते हैं। मुसलमानों के बीच देखा जाए तो एक कठमुल्ला सारी समस्याओं की जड़ बेटी को ही बताता है, जबकि मुहम्मद साहब बेटी को ‘रहमत’ कहते हैं। धर्म का ठेकेदार कहेगा कि कुरआन के अनुसार औरत को परदा करना चाहिए, लेकिन वह आपको यह नहीं बताएगा कि उसी कुरआन (अध्याय 24) के मुताबिक मर्द को भी परदा करना चाहिए! इसके अलावा, परदा करने की वजह नहीं बताई जाएगी। बहरहाल, देश में महिला शिक्षा का स्तर जरूर बढ़ा है, लेकिन इस शिक्षा ने उन्हें कितना स्वावलंबी बनाया है, यह सवाल ज्यों का त्यों बना हुआ है। आजकल मुसलिम घरानों में लड़कियों को इसलिए पढ़ाया जा रहा है, ताकि शादी के बाद वे किसी नौकरीपेशा युवक के जीवन-स्तर को बनाए रख सकें! इस तरह तो औरत की तरक्की होने से रही!

 

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