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भ्रम दरवाजा

मधुर राय पिछले दो-तीन सालों से एक के बाद एक आस्था के किले ढह रहे हैं। विश्वास के जो दुर्ग अजेय समझे जाते थे, आज ‘हकीकत’ की सेना वहां अपने परचम लहरा रही है। आसाराम की ‘आशा’ गई, निर्मल बाबा की ‘निर्मलता’ गई और हाल में रामपाल की ‘पालकी’ भी गई। मालूम होता है जैसे […]

मधुर राय

पिछले दो-तीन सालों से एक के बाद एक आस्था के किले ढह रहे हैं। विश्वास के जो दुर्ग अजेय समझे जाते थे, आज ‘हकीकत’ की सेना वहां अपने परचम लहरा रही है। आसाराम की ‘आशा’ गई, निर्मल बाबा की ‘निर्मलता’ गई और हाल में रामपाल की ‘पालकी’ भी गई। मालूम होता है जैसे विश्व के प्राचीनतम धर्म मे परिष्करण और संश्लेषण का दौर चल रहा हो।

संसार का कोई भी समाज नहीं है जो किसी न किसी कानून-कायदे से न चलता हो। लेकिन इन स्वयंभू बाबाओं या भगवानों को जो ठीक लगता है, वह ठीक और जो इन्हें गलत लगता हैं वह गलत। हैरानी होती है कि जीवन भर इनके प्रवचन धर्म, अर्थ और काम पर होते हैं, पर खुद उसी पगडंडी पर चलने के बजाय ये अनैतिकता के औजार से उसे मनमाफिक समतल करते हैं और फिर चढ़ाई करते हैं। पता नहीं गांव की भोली-भाली महिलाओं का शोषण करने की हिम्मत इन्हें कौन-सा पंथ या धर्म देता है। पर हम भी अजीब ही हैं। परेशानियों से दूर किसी सुकून को ढूंढ़ते हुए तलाश अगर किसी बाबा के आश्रम पहुंच कर ही खत्म होगी तो आस्था ठोकर खाएगी, श्रद्धा रौंदी जाएगी।

डैन ब्राउन के उपन्यास पर रॉन हावर्ड ने एक बेहद खूबसूरत फिल्म बनाई थी ‘एंजिल्स एंड डेमन्स’। इस फिल्म का एक शानदार संवाद है कि ‘धर्म में दोष है, क्योंकि इंसान में दोष है।’ बिल्कुल सही बात है। पर बेहतर होता कि हॉवर्ड ये बता पाते कि इस दोष का उपचार क्या है! शिक्षा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी नहीं है इसका उपचार, वरना ब्रिटेन के चिकित्सक बगदादी के मोहरे बन कर इराक और सीरिया में धर्म के नाम पर यों बेमतलब खून-खराबा नहीं करते। जड़ें कहीं और हैं और हम अभी भी तने काट रहे हैंं। रामपाल ने कबीरपंथी की चाल बखूबी चली। शायद इसलिए कि देश के दो बड़े धार्मिक समुदायों के लिए कबीर अस्पृश्य नहीं हैं। इस तरह रामपाल ने आस्था के खेल में भी संख्याबल को महत्ता दी। कबीर ने जितना प्रहार हिंदू अंधविश्वासों पर किया, उतना ही मुसलिम मत के ऐसे ही विश्वासों पर। पर कबीर के इस प्रहार में कहीं भी अराजकता नहीं थी, प्रतिकार की भावना नहीं थी। जीवन का सहज मार्ग अपना कर आत्मा को पहचानना भर ही तो था! पर रामपाल ने कबीर को तो वहीं रखा, पर कबीरपंथ की नींव हिला दी।

कार्ल मार्क्स कितने दूरदर्शी और प्रासंगिक हैं, मैं नहीं जानता। पर धर्म के बारे में उनकी राय से न तो कोई मुल्ला कुपित होगा, न कोई पंडित। उलटे रामपाल जैसे ‘भगवानों’ या बाबाओं के लिए तो ये जीवन की प्रस्तावना है। आप गौर करें, रामपाल के भक्तों पर। ये सब अधिकतर बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान से हैं। यह तथ्य तो बीमारू राज्य की परिकल्पना का आधार को ही चुनौती दे रहा है। तो क्या इन राज्यों में विशेष राहत पैकेज की जगह तर्क और विज्ञान का पैकेज भेजा जाए? पर भेजेंगे कहां से? ‘ब्रेन-ड्रेन’ भी तो हैं कहीं! अगर भेज भी दिया तो मंगल मिशन के बाद विज्ञान के क्षेत्र में यह भारत की अभूतपूर्व सफलता होगी। सामाजिक निष्क्रियता भी कहीं-कहीं धर्म की सक्रियता समझी जाती है। पर सक्रिय-अक्रिय के खेल में वह क्यों फंसे जो स्थिति में परिवर्तन चाहता हो।

लेकिन उन भक्तों का क्या, जिन्हें अपनी आंखों पर पट्टी लगाए रहने में ही मजा आ रहा है, जबकि उन्हें नहीं पता कि यह जीवन उन्हें संजय बनने की काबिलियत भी देता है, जो अपनी आंखों से सब सच देख सकता है। खुद से हारे लोगों का ठिकाना रामपाल जैसे तमाम बाबाओं की चौखट होती है। इस चौखट पर दम टूटे या न टूटे पर भ्रम जरूर टूटता है।

 

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