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संघर्ष की दिशा

अर्चना राजहंस मधुकर जनसत्ता 14 नवंबर, 2014: हाल ही में केरल में एक पब पर हमले के प्रतिरोधस्वरूप कई हिस्सों से ‘किस आॅफ लव’ के नारे के साथ प्रदर्शन की खबरें आर्इं। इस पहल के पक्षधरों का मानना है कि महिलाएं सिर्फ ‘वस्तु’ नहीं हैं कि उनके जीवन को कोई नियंत्रित करे। दूसरी ओर, कुछ […]
Author November 14, 2014 12:16 pm

अर्चना राजहंस मधुकर

जनसत्ता 14 नवंबर, 2014: हाल ही में केरल में एक पब पर हमले के प्रतिरोधस्वरूप कई हिस्सों से ‘किस आॅफ लव’ के नारे के साथ प्रदर्शन की खबरें आर्इं। इस पहल के पक्षधरों का मानना है कि महिलाएं सिर्फ ‘वस्तु’ नहीं हैं कि उनके जीवन को कोई नियंत्रित करे। दूसरी ओर, कुछ समय पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत कहा था कि महिलाओं को कुशल गृहिणी होना चाहिए। आज की स्त्री दोनों पाटों के बीच उलझी है। इसके अलावा, बाजार स्त्री को कठपुतली की तरह नचाता रहता है। सवाल है कि स्त्री की आजादी का रास्ता क्या होगा! दिल्ली में ‘किस ऑफ लव’ के आयोजन का विरोध करने वालों को रूढ़िवादी करार दिया गया। मगर पश्चिम से आए इस तरह के चलन को प्रगतिशील होने का परिचायक कैसे मान लिया जाए! ऐसा क्यों होता है कि स्त्री की देह और उसके स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर यह प्रगतिशील खेमा खोजने से भी नहीं मिलता? क्या यह कोई छिपा तथ्य है कि इस देश में आज भी लड़कियों के ‘मासिक धर्म’ और ‘रजोनिवृत्ति’ जैसी बातों पर चर्चा तक नहीं होती और जो सीधे-सीधे स्त्री के स्वास्थ्य से जुड़ा सवाल है? जिस देश में ‘सैनिटरी नैपकिन’ तक खरीदने में शर्म को चस्पां कर दिया गया है, वहां ‘किस ऑफ लव’ जैसे आंदोलनों का क्या महत्त्व हो सकता है! इस आंदोलन में लगे लोग इस बात की वकालत क्यों नहीं करते कि गांवों-कस्बों में महिलाओं के लिए शौचालय कितना आवश्यक है?

भारत में एक अजीब किस्म का दोहरापन देखा जाता है। सैनिटरी नैपकिन से लेकर मांस-मछली तक काली पन्नी में बेचे जाते हैं। इसकी वजह यह है कि सैनिटरी नैपकिन स्त्रियों के निहायत निजी अंग और शारीरिक इस्तेमाल के लिए होते हैं। दूसरी ओर, मांस-मछली में ‘नजर लगने’ का यह डर और वहम काम करता है! सैनिटरी नैपकिन तो जब आप खरीद रहे होते हैं तो एक बड़ी झिझक काम कर रही होती है! आप दुकानदार से न तो उसकी कीमत पर ठीक से बात कर सकते हैं, न गुणवत्ता पर। दुकानदार झट से काली पन्नी या अखबार में लपेट कर आपको वह पकड़ा देगा।

प्रेम और चुंबन कहीं से भी गलत नहीं है। लेकिन इसके जरिए जिस स्त्री आजादी की बात की जा रही है, वह भ्रम में डालने वाला है। हमारे यहां आज भी किशोर उम्र में पहुंच जाने वाली बच्ची आमतौर पर मासिक धर्म जैसे विषय से अनजान होती है। इसके अलावा, कम से कम निजी क्षेत्र के तमाम दफ्तरों में महिलाओं के लिए माहवारी के दौरान की परेशानियों के मद्देनजर किसी छुट्टी का इंतजाम नहीं है। जबकि दुनिया के जीवन में स्त्री की इस परेशानी का क्या योगदान है, यह सभी जानते हैं। आमतौर पर सभी लोग इस मसले और महिलाओं की स्थिति के बारे में जानते हैं। लेकिन घर के किसी पुरुष के सामने इसका जिक्र तक नहीं किया जा सकता। हालत यह है कि लड़की को अपने अंत:वस्त्र तो दूर, छोटा तौलिया तक खुले में सुखाने के लिए न जाने कितनी जद्दोजहद से गुजरना पड़ता है।

दरअसल, इस देश में दो जहान बसते हैं। सामान्य चलन में एक को ‘भारत’ और दूसरे को ‘इंडिया’ के प्रतीक से देखा जाता है। ‘किस ऑफ लव’ यहां ‘इंडिया’ का हिस्सा है और उसे महिलाओं के शरीर या स्वास्थ्य से जुड़ी बाकी तमाम समस्याओं से कोई मतलब नहीं है, क्योंकि यह ‘भारत’ की महिलाओं की तकलीफ है।

 

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