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अपनी तरह नायक

अविनाश कुमार चंचल वह हमारी तरह ही किराए का कमरा खोजता, कॉलेज में किसी महिला मित्र को चिट्ठी लिखता, बस की कतार में खड़ा कुछ निहारता रहता, अकेले लड़कों के रहने के लिए बने लॉज में रहते हुए पानी का इंतजार करता, क्लर्क की नौकरी करता, कॉफी हाउस में अपनी किसी महिला दोस्त के साथ […]

Author December 11, 2014 2:00 PM

अविनाश कुमार चंचल

वह हमारी तरह ही किराए का कमरा खोजता, कॉलेज में किसी महिला मित्र को चिट्ठी लिखता, बस की कतार में खड़ा कुछ निहारता रहता, अकेले लड़कों के रहने के लिए बने लॉज में रहते हुए पानी का इंतजार करता, क्लर्क की नौकरी करता, कॉफी हाउस में अपनी किसी महिला दोस्त के साथ बैठा रहता, अपने मित्रों के साथ दुनिया जहान की बातें करता, बीच-बीच में अपने बालों को कंघी से संवारता, रूमाल से मुंह पोंछता। वह कभी किसी दूसरी दुनिया का ‘सुपरमैन’ नहीं लगता। झोला लटकाए, अपने बजाज स्कूटर को किक मार कर स्टार्ट करने की कोशिश करते, किसी महिला दोस्त के साथ इंडिया गेट पर घूमते, सिनेमा देखने जाते, पार्क में बैठ कर बातें करते, कभी गांव में बस से उतरते, कभी रेलवे स्टेशन से घर जाने के लिए तांगे की सवारी करते हुए वह कभी हमसे अलग नहीं लगा, बल्कि हमेशा अपने बीच का ही कोई आदमी लगता। मानो हममें से ही कोई एक उठ कर उस बड़े से रुपहले परदे पर चला गया हो। उसकी फिल्मों को देखते हुए अक्सर हमें लगता कि हमारी रोजमर्रा की जिंदगी को ही किसी ने बड़े परदे पर उठा कर रख दिया हो।

वह यथार्थवाद के इतना करीब था कि उसकी बेरोजगारी, सिगरेट के लिए खत्म हो गए पैसे, सेकेंड हैंड मोटरसाइकिल, किसी अंगरेजी रेस्तरां में चम्मच से न खा पाने की मजबूरी, उसके सुख-दुख, मूंछों के बीच अचानक से फूट पड़ने वाली हंसी, सब कुछ अपना ही हिस्सा लगता। उसका बेल-बटन फूलपैंट, स्लीव शर्ट, पतली मूंछ, बड़े शीशे वाला चश्मा, कानों तक लंबे बाल ठीक वैसे ही थे, जो हमने अपने घर के अलबम में पापा, मामा, चाचा आदि की जवानी की तस्वीरों में देख रखे थे।

परदे पर उसकी प्रेमिकाएं किसी पारंपरिक हिंदी फिल्मों की तरह अचानक से नाचती-गाती नहीं मिलतीं। बल्कि वह उसके आसपास ही पड़ोसी के घर, मोहल्ले या कॉलेज-दफ्तर में साथ-साथ काम करती मिलतीं। हमारी तरह उसका दिल भी किसी लड़की को प्रेम-प्रस्ताव देना तो दूर, उससे बात तक करने में धक-धक करने लगता। महीनों-सालों वह सिर्फ उस लड़की को निहारता रह जाता, उसके बगल वाली सीट पर बैठ कर ही खुश होता रह जाता। उस लड़की के समय पूछ लेने भर से न जाने कितने खयालों को मन में उकेर बैठता। वह उन फिल्मी हीरो की तरह नहीं था, जो अकेले ही न जाने कितनों को निपटा देते। वह तो हमारे चाचाजी की तरह था, हमारी तरह था, अपने बॉस के सामने हाथ जोड़े, दफ्तर-कॉलेज या आस-पड़ोस की आंटियों के सामने दुबका-सहमा विनम्र छवि बनाए रखने वाला।

हम जब उसे परदे पर देखते हैं तो सिर्फ उसे नहीं देख रहे होते, बल्कि अपने दब्बूपन, आम आदमी होने की लघुता को भी नाप रहे होते हैं। भारी-भरकम सुपर हीरो वाले अहसास से इतर अपने दब्बूपन को सिनेमाई कविता में पिरोए जाने का सुख महसूस कर रहे होते हैं। जब भी ऐसा होता है, हमें अपनी साधारण कहानी भी बहुत खास लगने लगती है। साधारण होने की लघुता को बड़े रंगीन रुपहले परदे पर करीने से सजाने वाले उस नायक को याद करने के लिए मुझे कभी अलग से कोशिश करने की जरूरत नहीं पड़ी। वह कभी महानायक नहीं बनने की इच्छा रखने वाला अमोल पालेकर मुझे अपने बहुत करीब लगता है।

 

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