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प्रतिबद्धता के संगम

कवि, कथाकार, नाटककार, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता, अपने देशकाल पर सजग और चौकस निगाह रखने और अपने सृजन से सार्थक हस्तक्षेप करने वाले बुद्धिजीवी परेश सिन्हा अब हमारे बीच नहीं रहे। संवेदनशील, हंसमुख, मिलनसार परेशजी अपने समकालीनों में सबसे प्रौढ़ और परिपक्व थे।

कभी किसी के पीछे नहीं गए, किसी से कुछ मांगा नहीं, अपनी धुन में लगे रहे। उनकी सृजनात्मकता अनेक विधाओं में प्रस्फुटित हुई, लेकिन उनकी सबसे पुख्ता पहचान नाटककार की रही है। उन्होंने अनेक चर्चित नाटक लिखे, मसलन ‘गांधी नहीं मरेगा’, ‘कटे हुए लोग’, ‘चेहरा दर चेहरा’ आदि। परेशजी ने भारतीजी की प्रसिद्ध कविता ‘मुनादी’ का नाट्य रूपांतरण किया और पटना के आयकर चौराहे पर स्थापित जेपी की प्रतिमा के अनावरण के अवसर पर उसका मंचन किया था। उसी जगह जेपी पर लाठियां चली थीं।

परेशजी की पीढ़ी स्वाधीनता के नवोन्मेष में जवान हुई थी, जिसकी आंखों में नए खुशहाल भारत का सपना था। अल्पवय में पिता को खो देने से परेशजी के लिए पढ़ाई-लिखाई के बाद रोजी-रोजगार अनिवार्य तो था, लेकिन वे राजनीतिक-सांस्कृतिक गतिविधियों से शुरू से ही जुड़े रहे। लेखन के क्षेत्र में वे साठ के दशक से सक्रिय थे। इसी दौर में वे समाजवादी आंदोलन से भी जुड़े। बाद में रोग-शोक झेलते हुए भी परेशजी सृजनरत रहे। ‘जबड़ों की छांह में’, ‘उत्तर दो यक्ष’ (कविता संग्रह ), ‘तीन-तेरह लोग’ (कहानी संग्रह ), ‘गांधी नहीं मरेगा’ (नाटक संग्रह) उनकी प्रकाशित कृतियां हैं। उनकी अनेक रचनाएं अभी भी अप्रकाशित हैं। उनकी प्रतिबद्धता इन पंक्तियों में झलकती है- ‘झोंपड़ों पर फूस हम कुछ और देंगे/ सरकंडे, खमाची, बांस-बल्ले/ और बंधन बांध कर अपनी नसों के/ सृजन को हम एक नया आयाम देंगे/ इसलिए कि सिरजना ही है/ सहज अभ्यास अपना।’

मैं उनकी आलोचकीय दृष्टि का कायल रहा हूं। दिसंबर 2012 में पूरा हुए और अब तक अप्रकाशित मेरे उपन्यास का उन्हें बहुत इंतजार था। आखिर उनका कहा सच हुआ- ‘लगता है कि मेरे जाने के बाद ही आपका उपन्यास आएगा!’ चौहत्तर आंदोलन की परिवर्तनकामी धारा पर केंद्रित यह उपन्यास आ गया होता, तो मुझे यह अफसोस न रहता! बने रहें हिंदी के प्रकाशक और उनके काबिल ‘विशेषज्ञ’! उनकी सत्ता और साम्राज्य बना रहे! परेशजी एक ओर आंदोलन में सक्रिय थे तो दूसरी ओर श्रमसंघ गतिविधियों में भी शामिल थे। 1975 की रेल हड़ताल में उन्हें जेल जाना पड़ा।

छूटे तो आपातकाल का समय था। उन्हें फौरन भूमिगत होना पड़ा। इस दौरान वे जगह-जगह घूमते रहे और मुंबई में खासा वक्त बिताया। इसी दौर में उनकी कमलेश्वर से नजदीकी हुई और शायद उनका सहयोग भी प्राप्त हुआ। जबकि कमलेश्वर की लाइन उनसे एकदम अलग, बल्कि उलटी थी। कवि गोपीवल्लभ सहाय उनके घनिष्ठ मित्र थे। गोपीवल्लभजी के निधन के बाद परेशजी उनकी पुण्यतिथि पर साहित्यिक आयोजन करते थे। कई वर्षों तक यह क्रम चला, बाद में स्वास्थ्य गिरने लगा तो यह क्रम भंग हुआ।

एक-डेढ़ महीने पहले मुकेश प्रत्यूषजी से खबर मिली कि परेशजी अस्पताल में हैं। मैं भगवती प्रसाद द्विवेदी के साथ अस्पताल में उन्हें देखने गया। वे कष्ट में थे, बेचैन थे। कुछ देर की बातचीत के बाद लेटे-लेटे हाथ जोड़ दिए- ‘चलने का वक्त लगता है, आ गया है! गलती-सलती सब माफ कीजिएगा!’ उनके चेहरे पर अभी तेज था, हमने उन्हें भरोसा दिलाया कि वे जल्दी स्वस्थ होकर घर लौटेंगे। बाद में उन्हें दिल्ली ले जाया गया, जहां गंगाराम अस्पताल में इलाज के दौरान इसी पंद्रह जुलाई को उनका निधन हो गया। समाजवादी आंदोलन के एक और पुरोधा चले गए। जितने विचारशील उतने ही हंसमुख, निस्पृह और मिलनसार परेशजी की अनुपस्थिति बहुत खलेगी।

शिवदयाल

 

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