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हैसियत की सत्ता

सफलता तो अन्य परीक्षाओं में भी लोगों को मिलती हैं, लेकिन वे व्यक्तिगत उपलब्धियों तक ही सीमित हो जाती हैं। फिर सिविल सेवा में व्यक्तिगत उपलब्धि सार्वजनिक महत्त्व का क्यों बन जाता है? दरअसल, यह एक मायने में देश की सबसे बड़ी और कठिन प्रतियोगिता परीक्षा है।

इस नाते सफलता की खुशी जायज है! लेकिन इसका ऐसा प्रदर्शन क्यों? चूंकि यह एक ऐसी परीक्षा है, जिसमें सफल होने के बाद अचानक व्यक्ति का ‘वर्गीय प्रमोशन’ हो जाता है, जो अन्य क्षेत्रों में सफल होने पर तुलनात्मक रूप में नहीं हो पाता है, इसलिए इसकी सामाजिक स्वीकार्यता अधिक है। औपनिवेशिक काल से ही सिविल सेवकों की प्रतिष्ठा अत्यधिक रही है। आज भी गांवों में लोग इन्हें ‘साहब’ कह कर संबोधित करते हैं। इसलिए लोग व्यक्तिगत और सामूहिक कल्याण के लिए भी इनसे निकटता स्थापित करना चाहते हैं।

फिर यही वे अधिकारी होते हैं, जिन्हें आगे चल कर देश के शासन में भूमिका निभानी होती है। इसलिए अलग-अलग हित समूह इनसे खुद को संबद्ध करने लगते हैं। उदाहरण के लिए हिंदीभाषी लोग सोचते हैं कि हिंदी माध्यम से चुने हुए अधिकारी आगे चल कर अपनी भाषा के लिए कुछ ठोस कार्य करेंगे।

इसलिए उनसे अपनापन महसूस करते हैं। उसी प्रकार किसी खास जाति से चयनित अभ्यर्थियों के बारे में उन वर्गों की ऐसी ही अपेक्षा रहती है। फिर यह खांचागत विभाजन धर्म और क्षेत्र के स्तर तक चला जाता है। इसके अलावा, मुख्यधारा का मीडिया, जो आमतौर पर किसी दूरस्थ इलाके में हुई मौतों को भी नहीं दिखाता, इसका कई दिनों तक प्रसारण कर सिविल सेवा के प्रभावशाली दबदबे के प्रति सहमति दर्शाता है।

सकारात्मक रूप में सोचें तो सफल उम्मीदवारों के माध्यम से यह जानने का प्रयास किया जाता है कि नई पीढ़ी किस नए सोच के साथ आई है। इससे एक उम्मीद बंधती है। इतने प्रचार के बाद चयनित अभ्यर्थियों में यह बात घर कर जाना आम है कि वह सामान्य से कुछ हट कर है।

ज्यों-ज्यों यह भावना मजबूत होती जाती है, उनके अंदर एक विशेष प्रकार का आत्मविश्वास पनपने लगता है। इस आत्मविश्वास की परत इतनी मजबूत हो जाती है कि फिर अन्य सभी पहचान दब कर रह जाती है। जो अब तक विभिन्न समूहों से जोड़े जा रहे थे, अब वे एक चरित्र में ढल जाते हैं- शासकीय चरित्र। यह सब अनायास नहीं होता है।

बचपन से ही समाज हमें यह बताता रहता है कि एक बार आइएएस बन कर लालबत्ती ले लो, फिर पूरा संसार ही तुम्हारा है। इन्हें सूक्ष्मता से देखें तो पाएंगे कि ये सामाजिक व्यवहार न केवल इन अफसरों को असीमित अधिकार प्रदान कर रहा है, बल्कि उसे अनैतिक आचरण के लिए प्रोत्साहित भी कर रहा है।

यही कारण है कि इन सेवकों और जनता के बीच दूरी लगातार बढ़ती जा रही है। आए दिन यह खबर सुनने को मिलती है कि फलां सरकारी अफसर ने अपने अधीनस्थ या फिर आम जनता के साथ बदसलूकी की। दरअसल, जिस सत्ता की हनक के लिए हम उन्हें कोसते हैं, उस बेलगाम सत्ता को उन तक पहुंचने में हम भी बराबर के भागीदार रहे हैं। शुरू में हम ही उन्हें सामान्य से अलग पहचान देते हैं। एक सिविल सेवा में जाने की इच्छा रखने वाले विद्यार्थी होने के बावजूद मैं यह कहना चाहूंगा कि इस धारणा को बदलना होगा, तभी शासन और जनता के बीच की दूरी कम हो पाएगी।

 

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