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कड़वा गन्ना

नए साल में यह सरकार नए इरादों के साथ देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पटकथा लिखने में व्यस्त है। सरकार कभी स्मार्ट सिटी की बातें करती है तो कभी बुलेट ट्रेन की। विकास के इन सारे वादों और अच्छे दिनों की राह ताकते हुए देश के गन्ना किसान आज भी केवल इंतजार करने को […]

Author January 30, 2015 3:23 PM
दिल्ली और चेन्नई के बीच 1,754 किलोमीटर लंबा ‘हाईस्पीड’ गलियारा तैयार करने की योजना है।

नए साल में यह सरकार नए इरादों के साथ देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पटकथा लिखने में व्यस्त है। सरकार कभी स्मार्ट सिटी की बातें करती है तो कभी बुलेट ट्रेन की। विकास के इन सारे वादों और अच्छे दिनों की राह ताकते हुए देश के गन्ना किसान आज भी केवल इंतजार करने को बेबस हैं। बीते लोकसभा चुनाव से लेकर अब तक देश के सबसे बड़े गन्ना उत्पादक राज्यों उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक के गन्ना किसानों के लिए कोई कारगर पहल नहीं की गई।

आंकड़ों के मुताबिक इन राज्यों में सरकारी और निजी मिलों पर किसानों का लगभग एक हजार करोड़ रुपए का भुगतान बाकी है। गन्ना एक नकदी फसल है, जो इसकी खेती में लगे किसानों के लिए खास महत्त्व रखती है। कभी बेटी के ब्याह में और कभी बच्चों की पढ़ाई में इसी फसल द्वारा कमाई गई नकदी किसानों के काम आती है। लेकिन गन्ने का मूल्य न तय हो पाने, चीनी मिलों द्वारा भुगतान रोक दिए जाने और पेराई सत्र के देर से शुरू होने जैसी वजहों से आज गन्ना किसान इस फसल को उगाने से भी हिचकिचा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में गन्ने की फसल के हालात साल-दर-साल बिगड़ते ही जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश गन्ना निदेशालय के आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में 2013-14 में गन्ने की खेती का क्षेत्रफल 23.60 लाख हेक्टेयर था, जो 2014-15 में घट कर 21.30 लाख हेक्टेयर रह गया। यह गिरावट लगभग दस फीसद की है। स्थिति और भी खराब हो सकती थी। दस फीसद की गिरावट के मायने पर गौर किया जाए तो समझ में आता है कि मध्य और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तेजी से गिरावट आई है। ये दोनों क्षेत्र भारत के गन्ना उत्पादन के मामले में तीस से पैंतीस फीसद तक की भागीदारी करते हैं।

इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह चीनी मिलों द्वारा समय से भुगतान न किया जाना है। उत्तर प्रदेश में चीनी मिल मालिकों की भी अपनी मजबूरियां हैं। इसके पीछे का इतिहास यह है कि 2004-2005 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने ‘शुगर प्रोमोशन पॉलिसी’ शुरू की, जिसके चलते कई निजी चीनी मिलों की स्थापना हुई।

लेकिन चुनाव में जाने से पहले सरकार ने किसान वोट बैंक के चक्कर में राज्य समर्थित गन्ना मूल्य में अप्रत्याशित बढ़ोतरी कर दी। यह सिलसिला अब तक चलता रहा और न्यूनतम समर्थित मूल्य अतार्किक रूप से बढ़ाया जाता रहा, जिसके चलते निजी क्षेत्र के मिल मालिकों की कमर टूट गई। आशय यह कि नीतियों के गलत क्रियान्वयन के कारण हालत यह हो गई कि गन्ना किसान और चीनी मिल मालिक दोनों एक भंवर में फसे हुए हैं। कहीं मिल मालिक आगामी सत्र में पेराई न करने का नोटिस दे रहे हैं तो कहीं किसान समय से भुगतान न मिलने के कारण मिलों पर ताला जड़ रहे हैं।

पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस समस्या की सुध लेते हुए खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री रामविलास पासवान सहित छह मंत्रियों को गन्ना किसानों की समस्या सुलझाने का निर्देश दिया। लेकिन अभी तक इस बारे में कोई कारगर उपाय होता नहीं दिख रहा है।

परिस्थितियां हाथ से निकलती जा रही हैं। अगर जल्दी ही कुछ ठोस उपाय नहीं किए गए तो किसान और मिल मालिक दोनों की कमर टूट जाएगी। अब देखना है कि सरकार कोई पहल करती है या गन्ने की कड़वाहट से हो रही आत्महत्या की एक और कड़ी का इंतजार करती है!

 

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