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सुरक्षा में सेंध

देशभक्ति की चाशनी में डूबी हिंदी फिल्मों की दुनिया से बाहर निकल कर देखें तो देश की एक अलग ही तस्वीर नजर आती है। विकास की सीढ़ियां चढ़ता यह देश भ्रष्टाचार के मामले में भी कम उन्नति नहीं कर रहा और इसीलिए भ्रष्ट देशों की सूची में हम काफी ऊपर पायदान में खडे हैं। हाल […]

Author March 23, 2015 9:18 AM

देशभक्ति की चाशनी में डूबी हिंदी फिल्मों की दुनिया से बाहर निकल कर देखें तो देश की एक अलग ही तस्वीर नजर आती है। विकास की सीढ़ियां चढ़ता यह देश भ्रष्टाचार के मामले में भी कम उन्नति नहीं कर रहा और इसीलिए भ्रष्ट देशों की सूची में हम काफी ऊपर पायदान में खडे हैं।

हाल ही में पता चला कि कुछ मंत्रालयों से गोपनीय और महत्त्वपूर्ण जानकारियां बाहर भेजी जाती हैं। इस संबंध में दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा ने पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय में एक गिरोह का पर्दाफाश किया। इसमें मंत्रालय के कुछ कर्मचारियों सहित पांच-छह बड़ी कंपनियों के कुछ बड़े अधिकारी भी शामिल हैं। अब यह भी पता चल रहा है कि कुछ अन्य मंत्रालय भी इसकी चपेट में थे। इसमें कोयला और ऊर्जा जैसे महत्त्वपूर्ण मंत्रालय शामिल हैं।

देखा जाए तो यह कोई ऐसा धमाका नहीं है जो पहली बार हुआ हो। इस तरह की बातें जब-तब चर्चा में आती रही हैं। लेकिन कुछ समय बाद सब कुछ भुला दिया जाता है। अब जबकि देश आर्थिक क्षेत्र के एक नए युग में प्रवेश कर रहा है, इन चीजों का महत्त्व समझ में आने लगा है। गौरतलब है कि देश के सभी नीतिगत फैसले मंत्रालयों मे ही लिए जाते हैं और इन फैसलों से कई प्रकार के लोगों, संस्थाओं या निजी क्षेत्र की कंपनियों के हित जुड़े होते हैं।

अगर लिए जा रहे फैसलों की जानकारी समय रहते प्राप्त हो जाए तो इनसे बड़ा लाभ लिया जा सकता है या फिर संभावित नुकसान से बचा जा सकता है। सरकारी कार्यालयों और मंत्रालयों के अंदर से इस प्रकार की महत्त्वपूर्ण सूचनाएं नियोजित तरीके से कर्मचारियों-अधिकारियों को लेन-देन की जरिए प्राप्त की जाती रही हैं। इसके लिए कंसल्टेंसी एजेंसी बना कर और महत्त्वपूर्ण सूचनाएं हासिल कर बड़ी कंपनियों को उपलब्ध किया या भारी रकम लेकर बेच दिया जाता है।

इस मामले में कानूनी कार्रवाई सरकारी गोपनीयता अधिनियम (आॅफिशियल सीक्रेट एक्ट) के तहत हो सकती है जिसमें काफी सख्त प्रावधान हैं। इसमें मुकदमा उस स्थिति में भी चलाया जा सकता है, जब किसी व्यक्ति विशेष की नीयत देश के हितों को नुकसान पहुंचाने की न भी रही हो।

इसमें यह प्रावधान है कि अगर कोई कंपनी दोषी पाई जाती है तो उसके प्रबंधन तंत्र से जुड़े हरेक व्यक्ति, यहां तक कि बोर्ड आॅफ डायरेक्टर्स को भी सजा हो सकती है। लेकिन ऊपरी तौर पर सख्त दिखने वाले इस कानून के अपने विरोधाभास हैं। सूचना के अधिकार कानून 2005 से इसका सीधा टकराव है। आरटीआइ के तहत कई उन सरकारी सूचनाओं को सार्वजनिक किया जाना चाहिए, जिन्हें यह कानून ‘गोपनीय’ मानता है।

जून 2002 में पत्रकार इफ्तिखार गिलानी को इसी कानून के तहत गिरफ्तार किया गया था। तब इस पर विवाद खड़ा हुआ था और सरकार को आखिर मामला वापस लेना पड़ा था। सेना की रिपोर्ट में उन सूचनाओं को ‘गोपनीय’ नहीं माना गया। इस संबंध में दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि सिर्फ ‘गोपनीय’ की मोहर लगा देने से पत्रकार को इसका दोषी करार नहीं दिया जा सकता।

इस गोपनीयता कानून में कई विवाद के बिंदु हैं। यह भी सच है कि कई बार इस कानून की आड़ में आम नागरिकों को जरूरी सूचनाएं भी उपलब्ध नहीं कराई जाती हैं। सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार रोकने के लिए सतर्कता आयोग है। लेकिन आज यह एक औपचारिकता भर बन कर रह गया है।

बहरहाल, अब जबकि बात सतह पर आ गई है, इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए। जरूरी है कि इस मामले की तह में जाकर दोषी लोगों को सख्त सजा दी जाए। इसके साथ ही सरकारी कार्यालयों की कार्यशैली को बदला जाए, काम और गोपनीयता के प्रति इन्हें जिम्मेदार बनाया जाए। परंपरागत फाइल व्यवस्था के स्थान पर कंप्यूटर कार्य-संस्कृति को विकसित करके उसे भी तकनीकी तौर पर सुरक्षित बनाया जाना जरूरी है, जिससे कोई भी व्यक्ति वहां रहने का अनुचित लाभ न उठा सके।

एलएस बिष्ट

 

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