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विवाद का जलसा

हिंदी के एक जाने-माने कवि प्रेमचंद गांधी की इस कविता की पंक्ति ने मुझे बांध रखा है- ‘चप्पल पहन कर सपने में नहीं जाना चाहिए…!’ इतनी कोमलता कविता में ही संभव है। कविता कोमलता रचती भी है और उसका निर्वाह भी उसी पवित्र भाव से करती है। हम चप्पल पहन कर मंदिर में नहीं जाते। […]

Author January 21, 2015 2:54 PM

हिंदी के एक जाने-माने कवि प्रेमचंद गांधी की इस कविता की पंक्ति ने मुझे बांध रखा है- ‘चप्पल पहन कर सपने में नहीं जाना चाहिए…!’ इतनी कोमलता कविता में ही संभव है। कविता कोमलता रचती भी है और उसका निर्वाह भी उसी पवित्र भाव से करती है। हम चप्पल पहन कर मंदिर में नहीं जाते। प्रेमचंद गांधी की कविता कहती है- ‘चप्पल पहन कर सपने में नहीं जाना चाहिए।’ लेकिन हमारे यहां तो कविता में ही चप्पल चल रही है। कुछ समय पहले छत्तीसगढ़ में एक बड़ा साहित्यिक जलसा हुआ। उसमें कविता भी हुई और चप्पल भी हुई। कुछ कविता में थी और कुछ कविता को लग रही थी। सुनने और सुनाने वाले तो चले जा चुके थे। लेकिन चप्पल अभी तक चल रही है। बेशक वह एक सरकारी आयोजन था। लेकिन सरकार निशाने पर नहीं है। सरकार को निशाने पर लिया भी नहीं जा सकता। राज्य के संस्कृति मंत्री अजय चंद्राकर ने तो थोड़े दिन पहले ही अपनी मंशा जता दी थी कि विचारधाराओं से परे, उनका इरादा साहित्यकारों के साथ मुक्त संवाद बनाने का है।

छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और हम जैसे लोगों की अपनी-अपनी अलग आशंकाएं हैं। मुझे जिस विषय में और जिस सत्र में बोलना था वहां, अपनी आशंका सार्वजनिक करने में मैंने कोई संकोच भी नहीं किया कि साहित्य के लिए निर्धारित सुविधा छीनी जा रही है। हां, इस बात का मुझे मलाल है कि कहानी पर बोलने या कविता पाठ से अलग करके मुझे ‘छत्तीसगढ़ का नया परिवेश: सहूलियतें और चुनौतियां’ विषय पर बोलने के लिए कहा गया। यह समझने में कोई दिक्कत नहीं हो सकती कि यह पवित्र सलाह तो मेरे उन्हीं साहित्यकार बंधुओं में से किन्हीं की तरफ से आई होगी जिनके सरोकार साहित्य से कम और सरकार और सरकारी अफसरों के साथ नजदीकियों में अधिक होते हैं। और साहित्यिक बिरादरी से उन्हें दिक्कतें होती हैं। शायद उनकी मंशा छत्तीसगढ़ में ऐसा ही नया परिवेश रचने की रही है कि सरकार से जवाब देते नहीं बने!

अगर यह जवाबदेही अकेले इस जलसे तक ही सीमित होती तो कोई भी आत्माभिमानी साहित्यकार गम खाकर अपने घर बैठ सकता था। लेकिन एक बार शुरू हो चुके इस ‘रायपुर साहित्य महोत्सव’ को आगामी वर्षों में भी होना है। और इससे भी महत्त्वपूर्ण एक प्रश्न इस राज्य के साहित्यकारों के सामने होना चाहिए। अगर याद हो कि ऐसे ही किसी अन्य समारोह के अवसर पर राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कहा था- ‘यहां से मैं छत्तीसगढ़ में सांस्कृतिक नव-जागरण की दिशा को देख रहा हूं!’ पता नहीं, ऐसा कैसे हुआ कि राज्य के मुख्यमंत्री का इतना महत्त्वपूर्ण संकल्प इस बड़े जलसे में पूरी तरह अ-उल्लिखित रह गया जो अत्यंत सामयिक भी होता और बाद में इस पर उनकी जवाबदेही भी बनती! लेकिन हमारे लिए फिर भी यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण होगा कि क्या सांस्कृतिक नवजागरण की वह दिशा हमारी अपनी ही ऐसी कोई कूटरचना होगी, जिसके सामने मुंह छिपाने की जगह भी नहीं बचे? जैसा इस जलसे के बाद हुआ या किन्हीं रूप में अब भी हो रहा है और रुकने का नाम नहीं ले रहा है, उसे किस रूप में देखा जाए!

 

सतीश जायसवाल

 

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