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दुश्चक्र का सामना

प्रफुल्ल कोलख्यान सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ समय पहले अपनी एक टिप्पणी में न्यायिक अति-सक्रियता से बचते हुए और कार्यपालिका की गरिमा के अनुकूल बहुत ही सार्थक और संतुलित बात कही है। निश्चित रूप से प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के संवैधानिक और नैतिक व्यवहार पर भरोसा करना चाहिए। ऐसे किसी भी व्यक्ति को मंत्रिमंडल या मंत्रिपरिषद में […]

Author November 22, 2014 10:13 AM

प्रफुल्ल कोलख्यान

सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ समय पहले अपनी एक टिप्पणी में न्यायिक अति-सक्रियता से बचते हुए और कार्यपालिका की गरिमा के अनुकूल बहुत ही सार्थक और संतुलित बात कही है। निश्चित रूप से प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के संवैधानिक और नैतिक व्यवहार पर भरोसा करना चाहिए। ऐसे किसी भी व्यक्ति को मंत्रिमंडल या मंत्रिपरिषद में शामिल नहीं करना चाहिए जो आपराधिक मामलों में संदेह के घेरे में हैं। टिप्पणी में संवैधानिक उम्मीद की बात बहुत सफाई से कही गई है और बाकी प्रधानमंत्री के विवेक पर छोड़ दिया गया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और जनप्रतिनिधि इस ओर ध्यान देंगे। नागरिक समाज के लिए भी इस न्यायिक मंतव्य का पाठ महत्त्वपूर्ण है। सामान्य तौर पर मंत्री बनने की बात चुनाव जीतने के बाद उठती है। चुनाव जीत कर जनप्रतिनिधि बनने के पहले आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग विभिन्न राजनीतिक दलों के उम्मीदवार बनते हैं।

इसके बाद चुने हुए सांसदों और विधायकों का बहुमत हासिल करने के बाद ही कोई प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बनता है। यहां बात ध्यान में रखने की जरूरत है कि किसी सांसद या विधायक को मंत्री बनाना प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार तो है, लेकिन किसी का प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बनना भी तो सांसदों या विधायकों के बहुमत से ही संभव होता है! मौजूदा संसद में चौंतीस फीसद सांसद आपराधिक पृष्ठभूमि वाले हैं।

इस दुश्चक्र से बाहर निकलना कठिन चाहे जितना भी हो, इसे असंभव नहीं माना जा सकता। इस पूरे प्रसंग को चुनाव सुधार की नागरिक प्रक्रिया की नजर से देखना चाहिए। जबकि हम चुनाव सुधार की प्रक्रिया को राजनीतिक प्रक्रिया की दृष्टि से देखने के ही अभ्यासी हैं। बदलाव की प्रारंभिक जड़ता की परिणतियों के अवरोधों के सांगोपांग को ध्यान में रखते हुए भी मेरा खयाल है कि नागरिक जमात हर प्रसंग को राजनीतिक नजरिए से देखने के अपने अभ्यास को बदल सकता है और नया अभ्यास प्रारंभ कर सकता है। हालांकि नागरिक जमात के काम करने के तरीके का हमारा हालिया अनुभव बहुत सुखद नहीं है। भ्रष्टाचार के खिलाफ नागरिक जमात के दबाव का चुनावी राजनीति में निवेश बहुत खतरनाक साबित हुआ। फिर भी प्रयास तो किया ही जा सकता है, क्योंकि इस दुश्चक्र से बाहर निकलने का रास्ता नागरिक जमात के वैयक्तिक सोच की सामूहिक गलियों से होकर ही निकलता है।

इसके अलावा, नागरिक जमात न तो राष्ट्रीय जमात होता है और न ही राजनीतिक। राष्ट्रीय होना भी राजनीतिक होना है। नागरिक होना भी राजनीतिक होना है लेकिन दोनों में महत्त्वपूर्ण अंतर है। नागरिक होने का सामाजिक या सामुदायिक बोध नागरिक को सत्ता की राजनीति के खास संदर्भ में अ-राजनीतिक होने को संभव कर लेता है। जबकि राष्ट्रीय होना नागरिक होने के सामाजिक या सामुदायिक बोध को समाप्त नहीं भी तो निष्क्रिय जरूर कर देता है और नागरिक के सत्ता की राजनीति के ही खास संदर्भ में राजनीतिक होने को संभव कर देता है। आगे अगर नागरिक जमात अपने अनुभव से सीखते हुए समाज-स्थानिक स्तर पर जुटने की कला सीख लेता है और संगठित राजनीतिक जमात में बदल जाने की दुर्बलता से बचने का रास्ता खोज लेता है तो न्यायिक टिप्पणी में जिस संवैधानिक उम्मीद को प्रधानमंत्री के विवेक पर छोड़ दिया गया है, उस उम्मीद पर खरा उतरा जा सकता है। जरूरी है कि नागरिक जमात न्यायिक टिप्पणी में उल्लिखित संवैधानिक उम्मीद को नागरिक के नजरिए से ही पढ़े। यह एक नागरिक चिंता है, यही इसकी ताकत भी है और शायद सीमा भी!

 

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