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चौपालः अपराध के विरुद्ध

उच्चतम न्यायालय ने 9 जुलाई 2018 के अपने फैसले में 16 दिसंबर 2012 के निर्भया कांड के दोषियों की फांसी की सजा बरकरार रखते हुए उसे उम्र कैद में बदलने की उनकी अपील ठुकरा दी है।

Author July 14, 2018 4:50 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

उच्चतम न्यायालय ने 9 जुलाई 2018 के अपने फैसले में 16 दिसंबर 2012 के निर्भया कांड के दोषियों की फांसी की सजा बरकरार रखते हुए उसे उम्र कैद में बदलने की उनकी अपील ठुकरा दी है। इस कांड ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था। देश के हर कोने से निर्भया के लिए न्याय और आरोपियों के लिए फांसी की आवाज उठ रही थी। मकसद सिर्फ यही था कि इस प्रकार के अपराध करने से पहले अपराधी सौ बार सोचे। लेकिन आज छह साल बाद भी ऐसे अपराध और उनमें की जाने वाली बर्बरता लगातार बढ़ती जा रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार 2015 में बलात्कार के 34651 और 2015 में 38947 मामले दर्ज हुए थे। 2013 में यह संख्या 25923 थी। कल तक महिलाओं और युवतियों को शिकार बनाने वाले वहशी आज पांच-छह साल की बच्चियों को भी नहीं बख्श रहे। आंकड़े बताते हैं कि 2016 में पोक्सो एक्ट के तहत छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार के 64138 मामले दर्ज हुए थे।

हाल ही की बात करें तो सूरत, कठुआ, उन्नाव, मंदसौर, सतना तक यहत्रासदी फैली है। आज हमारे समाज में बात सिर्फ बच्चियों अथवा महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों की नहीं है, बात इस बदलते परिवेश में ‘अपराध में लिप्त’ होते जा रहे हमारे बच्चों की और इन अपराधों के प्रति संवेदनशून्य होते एक समाज के रूप में हमारी खुद की भी है। आज ऐसे भी अनेक मामले सामने आते हैं जब महिलाएं धन के लालच में अथवा अपने किसी अन्य स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए कानून का दुरुपयोग करके पुरुषों को झूठे आरोपों में फंसाती हैं। एक ताजा मामले में भोपाल में एक युवती द्वारा प्रताड़ित करने पर एक मेडिकल कॉलेज में पढ़ने वाले युवक ने आत्महत्या कर ली। वह युवती ड्रग्स की आदी थी और युवकों से दोस्ती करके उन पर पैसे देने का दबाव बनाती थी।

दरअसल, कल तक आपराधिक पृष्ठभूमि वाले या आदतन अपराधी किस्म के लोग ही जुर्म करते थे लेकिन आज के हमारे इस तथाकथित सभ्य समाज में पढ़े-लिखे लोग और संभ्रांत घरों के बच्चे भी अपराध में संलग्न हैं। ऐसा नहीं है कि अशिक्षा, अज्ञान, गरीबी या मजबूरी के चलते समाज में अपराध बढ़ रहे हों। आज केवल रोमांच या नशे की लत भी हमारे छोटे-छोटे बच्चों को अपराध की दुनिया में खींच रही है। इसलिए बात आज एक मानव के रूप में दूसरे मानव के साथ हमारे गिरते हुए आचरण की है, हमारी नैतिकता के पतन की है, मृत होती जा रही संवेदनाओं की है, लुप्त होते जा रहे मूल्यों की है, आधुनिकता की आड़ में संस्कारहीन होते जा रहे युवाओं की है, स्वार्थी होते जा रहे हमारे उस समाज की है जो पर पीड़ा के प्रति भावना शून्य होता जा रहा है और अपराध के प्रति संवेदन शून्य।

बात हम सभी की अपनी ‘व्यक्तिगत’ जिम्मेदारियों से बचने की है, एक मां के रूप में, एक पिता के रूप में, एक गुरु के रूप में, एक दोस्त के रूप में, एक समाज के रूप में। बात अपनी ‘व्यक्तिगत जिम्मेदारियों’ को ‘सामूहिक जिम्मेदारी’ बना कर बड़ी सफाई से दूसरों पर डाल देने की है, कभी सरकार पर, तो कभी कानून पर। लेकिन हम भूल जाते हैं कि सरकार कानून से बंधी है, कानून की आंखों पर पट्टी बंधी है और हमने अपनी आंखों पर खुद ही पट्टी बांध ली है। पर अब हमें जागना ही होगा, अपनी भावी पीढ़ियों के लिए, इस समाज के लिए, संपूर्ण मानवता के लिए, अपने बच्चों के बेहतर कल के लिए। इसकी शुरुआत अपने घर से खुद ही करनी होगी, अपने बच्चों को अच्छी परवरिश दे कर, उनमें संस्कार डाल कर, उनमें संवेदनशीलता, त्याग और समर्पण की भावना के बीज डाल कर, मानवता के गुण जगा कर।

नीलम महेंद्र, फालका बाजार, ग्वालियर

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