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गलत तरीका

अग्निपथ योजना के तहत जहां अधिक से अधिक युवाओं को रोजगार मिलेगा वहीं सरकार पर भी पेंशन का बोझ कम होगा।

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Indian Army: भारतीय सेना के जवान। (एक्सप्रेस फोटो)

अग्निपथ योजना का विरोध देश भर में हो रहा है। सरकार की नीतियों का विरोध करना और अपने लिए लड़ना, नागरिकों का लोकतांत्रिक अधिकार है। मगर कैसे हमें सरकार की नीतियों का विरोध करना है, ये समझना भी जरूरी है। सरकार और कई जाने-माने लोगों के समझाने के बावजूद लोग समझने को तैयार नहीं। तो अब हम क्या समझें की सरकार समझाने में नाकाम हुई है या लोग समझने में?

अग्निपथ योजना के तहत जहां अधिक से अधिक युवाओं को रोजगार मिलेगा वहीं सरकार पर भी पेंशन का बोझ कम होगा। इस योजना के तहत युवाओं को चार साल तक सेना में योगदान देने के बाद, उन्हें निकाल दिया जाएगा, और सिर्फ पच्चीस प्रतिशत लोगों की नौकरी पक्की होगी, वहीं अन्य लोगों को पुलिस, और अन्य सुरक्षा व्यवस्था में नौकरी मिलने में आसानी होगी। पर युवाओं को यह मंजूर नहीं और वे अग्निपथ योजना के विरोध में रेलों को आग लगाना, सरकार की संपत्ति को बर्बाद करना, सड़क पर रखी गाड़ियों को जलाना जारी रखे हुए हैं।

क्या विरोध इसी सब से किया जा सकता है? और कोई रास्ता नहीं है? लोगों को यह सब करने से पहले सोचना चाहिए कि इन सबसे वे बस माहौल खराब कर रहे हैं। कितने लोगों की गाड़ियां जल कर राख हो रही हैं। कितनों की तो रेलें रद्द हो गर्इं, पर इन्हें उससे क्या लेना देना। सिर्फ किसी के बहकावे में आकर ऐसा करना और किसी भी चीज को बिना समझे फैसला लेना नासमझी है।
स्मिता उपाध्याय, प्रयागराज

दोष किसका

राजनीति में खरीद-फरोख्त कोई नई बात नहीं है। महाराष्ट्र में यह दूसरा प्रयास है। मध्यप्रदेश में इसका सफल प्रयोग हो चुका है और राजस्थान में कोशिश नाकाम रही। यह सब जानते हुए भी कुछ लोग इसे शिवसेना का आंतरिक संकट बता रहे हैं तो कोई उद्धव ठाकरे को हिंदुत्ववादी एजेंडे से हटने का दोषी करार दे रहा है। मातोश्री के बाहर उमड़ी कार्यकर्ताओं की भीड़ तो कुछ और ही बयान कर रही है।

अगर यह मान भी लिया जाए कि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने हिंदुत्ववादी एजेंडा छोड़ दिया तो यह सब एकनाथ शिंदे को ढाई साल बाद क्यों याद आ रहा है? यह ठीक वैसे ही है जैसे कोई यात्री सफर के लिए निकले और गलत बस या ट्रेन में बैठ जाए। आधा रास्ता सफर करने के बाद अचानक उसको लगे कि मैं गलत मार्ग पर जा रहा हूं, तो इसमें दोष किसका है?
नवीन थिरानी, नोहर

अव्यावहारिक फैसला

दिल्ली सरकार ने सर्दियों में बढ़ने वाले प्रदूषण की रोकथाम के लिए अक्तूबर से फरवरी यानी पांच महीने तक दिल्ली में भारी और मध्यम वाहनों के प्रवेश पर रोक लगाने का फरमान जारी कर दिया है। इस प्रतिबंधित अवधि में ये वाहन दिल्ली की सीमाओं पर अपना सामान उड़ेल कर वापस चले जाएंगे और फिर उस समान को छोटे वाहनों में भर कर दिल्ली में लाया जा सकेगा।

लेकिन क्या इस प्रक्रिया में दिल्ली की सीमाओं पर आने वालों ट्रकों से होने वाला प्रदूषण दिल्ली में प्रवेश नहीं कर सकेगा? यदि ऐसा हो सकता तो पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे सीमायी प्रदेशों के खेतों में जलने वाली पराली का धुंआ दिल्ली में प्रवेश न कर पाता। दिल्ली सरकार का प्रतिबंध लगाने का यह फरमान न तो युक्तिसंगत है और न ही समझदारी भरा।

इससे न केवल उपभोग का सामान डेढ़-दो गुनी कीमत का हो जाएगा, बल्कि लाखों मजदूरों, रेहड़ी-पटरी वालों और निजी नौकरीपेशा लोगों की आजीविका पर संकट खड़ा हो जाएगा। दिल्ली का भवन निर्माण उद्योग और व्यापार और अन्य छोटे और मझोले उद्योग तथा गैरजरूरी उपभोग श्रेणी से जुड़े व्यापार तबाह हो जाएंगे। इन उद्योगों और व्यापारों से जुड़े लोग पांच महीने तक क्या घर पर नहीं बैठ जाएंगे?

वाहनों के प्रवेश पर प्रतिबंध के बजाय क्षमता से अधिक वजन ढोते, प्रदूषण फैलाते सभी प्रकार के वाहनों पर कार्रवाई और जाममुक्त सड़कें जैसे उपाय करके प्रदूषण पर अधिक कारगर तरीके से रोक लगाई जा सकती है। इसके लिए दिल्ली और केंद्र सरकार को मिल कर विशेष दल गठित करना चाहिए और उसको भ्रष्टाचार रहित रख कर विशेषाधिकार दिए जाएं।
सतप्रकाश सनोठिया, रोहिणी

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