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असली रामराज!

पिछले दिनों लखीमपुर खीरी में ब्लॉक प्रमुख के चुनावों के दौरान कुछ विपक्षी दलों की महिला प्रत्याशियों के साथ भाजपा समर्थित गुंडों और विधायकों ने जिस तरह की हैवानियत दिखाई, वह किसी के लिए भी शर्म की बात है।

सांकेतिक फोटो।

पिछले दिनों लखीमपुर खीरी में ब्लॉक प्रमुख के चुनावों के दौरान कुछ विपक्षी दलों की महिला प्रत्याशियों के साथ भाजपा समर्थित गुंडों और विधायकों ने जिस तरह की हैवानियत दिखाई, वह किसी के लिए भी शर्म की बात है। इन घटनाओं से यह साबित हो गया कि उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं रह गई है और जंगलराज कायम होव चुका है। यह घटना कानून के कथित रखवाले सैकड़ों पुलिस जवानों और उनके अफसरों की मौजूदगी में हुई।

जिस महिला की चीरहरण हुआ वह एक राजनीतिक दल द्वारा समर्थित उम्मीदवार के रूप में अपना नामांकन भरने के लिए आई हुई थी। सवाल तो यह है कि इस घटना को अंजाम अचानक किसी गली-मुहल्ले के गुंडों ने नहीं दिया! बल्कि जिन्होंने और जिस तरह से दिया और पुलिस देखती रही, उससे साफ है कि यह सुनियोजित तरीके से और ऊपर के इशारे पर किया गया। और सबसे ज्यादा शर्मनाक तो यह कि जब इस शर्मनाक घटना के बाद जब सारा देश इसकी तीव्र भर्त्सना कर रहा था, तभी सत्ता के महामहिम उत्तर प्रदेश में इस चुनाव को ह्यशांतिपूर्वक ढंग से करानेह्ण के लिए धन्यवाद दे रहे थे। उत्तर प्रदेश क्या देश का असली रामराज्य यही है।
’निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

राजद्रोह का कानून

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से सवाल किया है कि क्या आजादी के पचहत्तर वर्ष बीत जाने के बाद भी आइपीसी की धारा 124 (ए) की आवश्यकता है? इस सवाल का जवाब सरकार को जरूर देना चाहिए। अंग्रेजों की बनाई आइपीसी और सीआरपीसी से ही हमारी न्याय प्रणाली आज भी संचालित हो रही है। आज दुनिया बदल चुकी है। अपराध और राजनीति के संदर्भ और स्वरूप बदल चुके हैं। ऐसे में इन दंड विधानों में मौजूद तमाम कानून आज के संदर्भ में अप्रासंगिक हो चुके हैं। इसलिए इस बात पर विचार करकना जरूरी हो गया है कि कोई धारा या कानून वर्तमान में कितना प्रासंगिक रह गया है। आज ऐसे कानूनों को हटाने की जरूरत है जो गैरजरूरी है या जिनका राष्ट्र हित या सुरक्षा की आड़ में जिनका दुरुपयोग किया जा रहा है।

अब यह किसी से छिपा नहीं रह गया है कि धारा 124(ए) का दुरुपयोग सरकार अपने विरोधियों को सबक सिखाने में कर रही है। जब किसी कानून या धारा का दुरुपयोग शुरू हो जाता है तो उसे रोकना जरूरी हो जाता है। सरकारें ऐसी पहल करने से इसलिए बचती हैं कि क्योंकि अधिकांश कानूनों का दुरुपयोग वे खुद ही करती हैं। अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए बना एट्रोसिटी एक्ट का आज भी शासन / प्रशासन द्वारा दुरुपयोग किया जा रहा है। इसके दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं संज्ञान लेकर इसमें कुछ बदलाव किए थे।

इसके विरोध में संपूर्ण अजा, अजजा वर्ग और साथ में मुसलिम व वामपंथी विचारधारा के लोग सड़कों पर आ गए थे। इसलिए वह संशोधन लागू नहीं हो सका था। यही स्थिति राजद्रोह कानून की भी होगी। इसमें भी यदि कोई बदलाव नहीं किया गया या इसे समाप्त नहीं किया गया तो इसका भी विरोध होना स्वाभाविक है। सुप्रीम कोर्ट और सरकार को सभी राजनीतिक दलों, दबाव समूहों, बुद्धिजीवियों और विचारकों से इस कानून के दुरुपयोग को रोकने हेतु सुझाव आमंत्रित कर ही कोई निर्णय लेना न्यायोचित होगा।
’दुर्गेश कुमार राजदीप, मंडलेश्वर (मप्र)

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