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चौपालः असुरक्षित बच्चे

देश में निजी स्कूलों की संख्या साल दर साल बहुत तेजी से बढ़ती जा रही है। शहरों के बाद कस्बों, गांवों में भी निजी स्कूलों की बाढ़-सी आ गई है।

Author August 2, 2018 3:32 AM
शिक्षा बोर्ड बिना किसी ठोस जांच-पड़ताल के निजी स्कूलों को मान्यता देते जा रहे हैं।

देश में निजी स्कूलों की संख्या साल दर साल बहुत तेजी से बढ़ती जा रही है। शहरों के बाद कस्बों, गांवों में भी निजी स्कूलों की बाढ़-सी आ गई है। शिक्षा बोर्ड बिना किसी ठोस जांच-पड़ताल के निजी स्कूलों को मान्यता देते जा रहे हैं। लेकिन निजी स्कूलों के संचालक लगातार सरकारी नियमों के विरुद्ध अपनी मनमानी पर उतारू हैं और लगातार मासूम बच्चों के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। सरकारी आदेश के अनुसार विद्यालयों में बच्चों को लाने और ले जाने के लिए सिर्फ बस का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

लेकिन देश के ज्यादातर निम्नस्तरीय निजी स्कूलों के संचालक सरकार के इस आदेश को धता बता रहे हैं और मात्र पैसों की खातिर मासूमों की जिंदगी साथ खिलवाड़ करने से भी गुरेज नहीं कर रहे हैं। लगातार एलपीजी गैस से चलने वाली कारों से और बिना फिटनेस पास डग्गामार टैक्सियों से बच्चों को लाया और ले जाया जा रहा है। लापरवाही का आलम यह है कि एक गाड़ी में बीस से पच्चीस बच्चों को जानवरों की तरह भर दिया जाता है जिससे कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है। आखिर उस हादसे का जिम्मेदार कौन होगा? विद्यालय संचालक, वाहन चालक या प्रशासन के लापरवाह अधिकारी? वैसे भी प्रशासन किसी बड़ी घटना के बाद ही अपनी नींद से जागता है और कार्रवाई के नाम पर खानापूर्ति करके फिर वही पुराने ढर्रे पर आ जाता है।

सवाल है कि प्रशासन सब कुछ जानते हुए क्यों अनजान बना रहता है? आखिर इन निजी विद्यालयों के संचालकों और जोखिम भरे वाहन मालिकों को अभयदान क्यों दिया गया है? प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारी एवं परिवहन विभाग इन वाहनों पर क्यों कोई कार्रवाई नहीं करता? क्या परिवहन विभाग किसी बड़े हादसे का इंतजार करता है! यों भी देश की सड़कों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। हर साल न जाने कितने लोग सिर्फ सड़क पर गड्ढा होने की वजह से जान गंवा रहे हैं। ऐसे में जोखिम से भरे वाहनों से बच्चों को लाना-ले जाना कितना खतरनाक है, इससे सभी वाकिफ हैं। लेकिन संबंधित महकमे और आला अधिकारी अपनी नैतिक जिम्मेदारी का अहसास शायद किसी हादसे के होने के बाद करते हैं! सरकार ऐसे मामलों में कड़ी कार्रवाई करे और विद्यालय संचालकों द्वारा परिवहन नियमों का हर हाल में पालन कराए, जिससे मासूम बच्चों का खयाल रख कर देश के भविष्य को सुरक्षित किया जा सके।

अंकित रजक, बिल्हारी-दतिया, मध्यप्रदेश

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