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चौपालः श्रमिकों के साथ

पिता कहते थे कि शिक्षा प्राप्त कर लोगे तो सब पा जाओगे; मैं शिक्षा नहीं पा सका, इसलिए जीवन में कष्ट है। पिता के निधन के बाद कुछ धनोपार्जन के उद्देश्य से मैं एक जगह प्राइवेट ट्यूशन के लिए जाने लगी थी।

Author April 30, 2016 02:55 am
प्रतीकात्नक तस्वीर

पिता कहते थे कि शिक्षा प्राप्त कर लोगे तो सब पा जाओगे; मैं शिक्षा नहीं पा सका, इसलिए जीवन में कष्ट है। पिता के निधन के बाद कुछ धनोपार्जन के उद्देश्य से मैं एक जगह प्राइवेट ट्यूशन के लिए जाने लगी थी। समाज की दृष्टि से वह एक भला और धनाढ्य परिवार था, जिसमें पति-पत्नी और दो बच्चे थे। दोनों लड़के थे। एक छठी कक्षा में और दूसरा आठवीं में पढ़ रहा था। उस घर में जो महिला थी यानी दोनों बच्चों की मां, वह कुछ ही दिनों में मेरी सहेली बन गई थी। वह पहुंचते ही मुझे मसाला चाय पिलाती थी। एक दिन जब मैंने उनसे पूछा कि यह कैसी चाय होती है तो वे सहज भाव से बोलीं कि यह राजस्थान के हर्बल मसाले से तैयार पेय है, जिसमें तुलसी, इलायची, दालचीनी आदि का मिश्रण होता है। एक दिन मैं ड्राइंग रूम में बच्चों को पढ़ा रही थी तो बगल वाले कमरे से पति-पत्नी के झगड़ने की आवाज सुनाई दी। महिला का पति उसे इसलिए बुरी तरह फटकार रहा था कि वह पढ़ाई न करने के कारण दोनों बेटों को डांटती थी। जब मैंने हस्तक्षेप किया तो उनका रवैया मेरे प्रति भी अच्छा नहीं था।

मैंने महिला के पति को समझाया कि शिक्षा मात्र इसलिए नहीं दी जानी चाहिए कि अन्य बच्चों की तरह आपके बच्चों को भी स्कूल जाने की औपचारिकता निभानी है, बल्कि इसलिए कि वह मनुष्य को मनुष्य बनाने के काम आती है। इस पर महिला के पति ने मुझे लेक्चर न देने को कहा और कुछ दिनों में उन्होंने वहां से मेरी छुट्टी कर दी। ऐसे कई किस्से हैं जो मेरे दिमाग में लोगों के मन-मस्तिष्क में बैठे दुराग्रह का खुलासा कर सकते हैं। नीचे से ऊपर की ओर बढ़ें तो शायद ऐसे ही लोगों के कारण आज स्कूल-कॉलेज और विश्वविद्यालय मात्र डिग्री हासिल करने का स्थान बन कर रह गए हैं, जहां समूची शिक्षा केवल व्यवसाय बन कर रह गई है। ऐसे में मेरे जैसे तमाम लोग खुद को अकेला और निरुपाय महसूस करते हैं जो शिक्षा को अपने जीवन की नाव का एकमात्र मांझी समझते हैं।

आज समाज में धनोपार्जन प्राथमिक उद्देश्य है और बाकी सभी व्यापार उसी से ओत-प्रोत है। शिक्षा का स्थान अब पहले की तरह ऊंचा और गरिमामय नहीं रह गया है। इस भौतिक संलिप्तता और बौद्धिक गिरावट के कारण जिस तरह का समाज बन रहा है, उसकी कल्पना भी मेरे जैसे व्यक्तियों के लिए मुश्किल है। आए दिन हो रही हत्या और आत्महत्या की घटनाओं के पीछे कहीं यही कारण तो नहीं है कि एक व्यक्ति दूसरे को अपने से हेय साबित करने पर तुला है। जिसके पास मकान है, वह बिना मकान वाले, जिसके पास कार है वह बिना कार वाले व्यक्ति को अपने से हीन और छोटा समझता है। इस तरह आपसी संबंधों का आधार मात्र भौतिक रह गया है। बिना मानवीय गुणों के यह संसार कितने दिन तक टिकेगा और अगर टिकेगा तो उसमें कितनी और किस हद तक गिरावट आएगी, ये प्रश्न भी उतने ही विचारणीय हैं।
हालत यह है कि विश्वविद्यालय जैसी जगहें भी अपनी प्रामाणिकता खो रही हैं। मतलब रह गया है तो सिर्फ रैंकिंग से। किसी विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा का मुद्दा अब इस बात से सीधे तौर पर जुड़ा है कि विश्व में उसका स्थान या रैंकिंग क्या है, फिर चाहे उसकी जड़ें कितनी ही खोखली क्यों न हो चुकी हों।

सपने देखने पर कोई प्रतिबंध नहीं है, लेकिन उन्हें देखने से लेकर सच करने तक पहले जो समाज साथ खड़ा रहता था, वह कहीं न कहीं बहुत पीछे छूट गया है। आज का व्यक्ति एकदम अकेला खड़ा है, साथ है तो उसका अच्छा-बुरा हुनर। विश्वविद्यालयों के बारे में ऐसी कई बातें अक्सर यहां के अनुभव प्राप्त वरिष्ठ विद्यार्थियों के मुंह से सुनने को मिलती रहती हैं कि अभी तुम विश्वविद्यालयों की राजनीति से पूरी तरह परिचित नहीं हो। सपने देखना अलग बात है और उन्हें पूरा करना दूसरी बात।

लेकिन सच यह है कि अपने घर से दूर हो जाने के बाद मुझे विश्वविद्यालय में ही पनाह मिली। अच्छे-बुरे लोग मिले, जिनसे अलग-अलग नसीहतें भी मिलती रहीं। आॅक्सीजन के सिलेंडर की तरह विश्वविद्यालय ने मेरी सांसों को बचाए रखा। यहां के खुले वातावरण में खुद को सुरक्षित ही महसूस किया मैंने। लेकिन अकेले डटे रहने का साहस सबमें नहीं होता। अकेले कर दिए जाने पर दो ही विकल्प रह जाते हैं- या तो आप समर्पण कर भीड़ के साथ चलें या फिर अपना मार्ग खुद अवलोकित करें। तब विश्वविद्यालय में राजनीति जैसी चीज से भी खुद निबटने की क्षमता आपको अर्जित करनी पड़ेगी। विश्वविद्यालय आने वाले को यह बात देर से ही सही, समझ जरूर आती होगी कि विश्वविद्यालय एक अलग और स्वतंत्र दुनिया है। यहां पर हर रास्ता चुनौती और जोखिम से भरा है।

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