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जीत के मायने

देश के सीमांत राज्य पंजाब में हाल में हुए स्थानीय निकाय चुनाव परिणामों का विश्लेषण इन शब्दों में किया जा सकता है कि विकल्पहीन विपक्ष वाले इस राज्य में जनता ने मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की कांग्रेस को जनादेश दिया।

Author Updated: February 22, 2021 6:12 AM
Punjabपंजाब में निकाय चुनाव में कांग्रेस को भारी जीत। फाइल फोटो।

‘कैप्टन कांग्रेस’ इसलिए क्योंकि पांच नदियों की इस धरती के संदर्भ में देश की सबसे पुरानी पार्टी में सोनिया-राहुल का केंद्रीय नेतृत्व हाथ की उस छठी अंगुली के समान है जिसका अस्तित्व तो है, परंतु भूमिका नहीं। कांग्रेस ने 2017 का विधानसभा चुनाव भी ‘चाहुंदा है पंजाब कैप्टन दी सरकार’ के नारे तले लड़ा था और आशातीत सफलता प्राप्त की। कैप्टन के ही नाम से कांग्रेस ने 2017 के बाद लोकसभा से लेकर पंचायत तक पांच चुनाव जीते हैं। स्थानीय निकाय के इन चुनावों को अगले साल फरवरी-मार्च में होने वाले विधानसभा चुनावों के सेमीफाइनल के रूप में देखा जा रहा है।

सामान्य बुद्धि से इन चुनाव परिणामों के पीछे किसान आंदोलन को एक बड़ी वजह माना जा सकता है, परंतु यह पूर्णरुपेण सच नहीं है, क्योंकि पराजित दलों में भाजपा के साथ-साथ अकाली दल बादल और आम आदमी पार्टी भी शामिल हैं जो एक दूसरे से आगे बढ़ कर किसान आंदोलन का समर्थन करती रही हैं। दूसरा वर्तमान निकाय चुनाव शहरी क्षेत्रों में लड़े गए, जहां किसान आंदोलन का प्रभाव नगण्य, बल्कि प्रभावित लोग अधिक निवास करते हैं। हां इतना जरूर कहा जा सकता है कि शहरों में रहने वाले किसान परिवारों ने खुल कर कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया हो सकता है।

इस संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि किसान आंदोलन के नाम पर खालिस्तानी आतंकवाद के उभार ने शहरी मतदाताओं को कांग्रेस के पक्ष में लामबंद किया हो। आतंकवाद के मोर्चे पर राष्ट्रीय परिस्थितियों के विपरीत पंजाबियों का अन्य दलों से अधिक कांग्रेस पर अधिक विश्वास रहा है। स्वर्गीय ज्ञानी जैल सिंह हों या दरबारा सिंह या फिर स्वर्गीय बेअंत सिंह, सभी पूर्व मुख्यमंत्री इस मोर्चे पर चुनाव जीतते रहे थे।

पंजाब में पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का प्रतीक मानी जाती हैं और वर्तमान मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह भी खालिस्तानी आतंकवाद के खिलाफ मुखर रहे हैं। इसके अलावा पिछले कई वर्षों से पंजाब में विपक्ष के पास कैप्टन के विकल्प का अभाव खलता आ रहा है। पिछले डेढ़-दो दशकों से राज्य की राजनीति अकाली दल के वयोवृद्ध नेता प्रकाश सिंह बादल और कैप्टन के बीच बराबरी का मुकाबला चला आ रहा था, परंतु विगत विधानसभा चुनावों में हार और वृद्धावस्था के चलते प्रकाश सिंह बादल राजनीति में निष्क्रिय हो चुके हैं।

अकाली दल के कई वरिष्ठ नेता प्रकाश सिंह बादल पर पुत्रमोह में दल का बंटाधार करने का आरोप लगा कर दल से किनारा कर चुके हैं। फिर, पंजाब में कांग्रेस के अस्सी विधायक, लोकसभा-राज्यसभा के दस सांसदों और सरकार हितैषी नौकरशाही का लाभ भी सत्ताधारी दल को मिला। यही कारण रहे कि राज्य में विकास के अभाव और सरकार में हजारों कमियों के बावजूद कांग्रेस ने निकाय चुनावों में एकतरफा जीत दर्ज करवाई है।
’ राकेश सैन, जलंधर

नैतिक मूल्यों का पतन

जनसत्ता में प्रकाशित संपादकीय- दुराचार का परिसर- पढ़ा। हमारी संस्कृति में गुरु का स्थान भगवान से भी ऊंचा है। गुरु-शिष्या का रिश्ता पिता-पुत्री रिश्ते के समान होता है। यदि विद्यालय परिसर में भी बेटियां महफूज नहीं रहेंगी तो बेटियां पढ़ेंगी कैसे? बिहार के एक निजी स्कूल के प्राचार्य और उसके सहयोगी द्वारा अपनी ही विद्यालय की छात्रा के साथ यौन शोषण करने की घटना ने संपूर्ण शिक्षा जगत को शर्मसार कर दिया है।

अदालत ने इसे जघन्य अपराध मानते हुए आरोपित प्राचार्य को सजा-ए-मौत सुनाई है। इससे पहले भी इस तरह की कई घटनाएं घटित हो चुकी है, हर घटना के उपरांत समाज में गुस्से का उबाल रहता है, कड़े कानून बनाए जाते हैं, लेकिन समस्या का समाधान नहीं निकल पाता है। कुछ दशक पूर्व तक बच्चों को उनके अभिभावक कहानियों के माध्यम से चरित्र निर्माण का कार्य करते थे, लेकिन आज कहानियों की जगह मोबाइल गेम और टेलीविजन ले ली है। बेटियों के लिए सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना समाज और सरकार दोनो का धर्म है।
’हिमांशु शेखर, केसपा, गया

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