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चौपालः समझ से परे

किसी भी संस्थान को ‘टॉप’ अर्थात उच्चता के शिखर पर आने में वर्षों लग जाते हैं और जब क्षेत्र शिक्षा का हो तो चुनौती और भी कड़ी हो जाती है। लेकिन जब अपने श्रम और योग्यता से बने उत्कृष्ट शिक्षा संस्थानों के बराबर एक ऐसे संस्थान को ला खड़ा कर दिया जाए जो अस्तित्व में ही नहीं आया है तो ऐसे निर्णय को क्या कहा जाएगा!

Author July 13, 2018 4:57 AM
देश के इन प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों के साथ उत्कृष्ट संस्थानों की सूची में जियो का नाम आने को शिक्षाविदों ने हास्यास्पद करार दिया है।

समझ से परे

किसी भी संस्थान को ‘टॉप’ अर्थात उच्चता के शिखर पर आने में वर्षों लग जाते हैं और जब क्षेत्र शिक्षा का हो तो चुनौती और भी कड़ी हो जाती है। लेकिन जब अपने श्रम और योग्यता से बने उत्कृष्ट शिक्षा संस्थानों के बराबर एक ऐसे संस्थान को ला खड़ा कर दिया जाए जो अस्तित्व में ही नहीं आया है तो ऐसे निर्णय को क्या कहा जाएगा! यह अजूबा सरकार के एक निर्णय में देखने को मिला है। केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा हाल ही में जारी की गई देश के छह एमिनेंस इंस्टीट्यूट (उत्कृष्ट संस्थानों) की सूची में एक ऐसे संस्थान को शामिल किया गया है जो अभी अस्तित्व में ही नहीं आया है। मंत्रालय द्वारा जारी सूची में तीन सरकारी और तीन निजी क्षेत्र के संस्थान शामिल किए गए हैं। इनमें सरकारी क्षेत्र से आइआइटी दिल्ली, आइआइटी मुंबई और आइआइएससी बंगलूर तथा निजी क्षेत्र से मनिपाल एकेडमी ऑफ हायर एजूकेशन, बिट्स पिलानी के साथ ही जियो इंस्टीट्यूट का नाम भी शामिल है। देश के इन प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों के साथ उत्कृष्ट संस्थानों की सूची में जियो का नाम आने को शिक्षाविदों ने हास्यास्पद करार दिया है।

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अजन्मे जियो संस्थान को उत्कृष्टता सूची में शामिल किया जाना ठीक वैसा ही है जैसे कि बच्चे के जन्म से पहले ही प्रवीणता की अंकसूची थमा दी जाए। यह उन संस्थानों का अपमान है जिन्होंने वर्षों की तपस्या के बाद उत्कृष्टता का वर्तमान मुकाम हासिल किया है। यह आग में तपकर कुंदन बने सोने को एक नवजात लोहे की छड़ के समतुल्य ला खड़े कर देने जैसा निर्णय है। प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस का तो स्पष्ट आरोप है कि एक उद्योग समूह को लाभ पहुंचाने के लिए यह निर्णय लिया गया है जबकि सरकार का कहना है कि जियो का नाम ग्रीन फील्ड कैटेगरी के तहत इस सूची में शामिल किया गया है जो कि नए संस्थानों के लिए होती है और उनका कोई इतिहास नहीं होता।

सरकार अब चाहे जो सफाई दे लेकिन आइआइटी दिल्ली जैसे प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थान, जिसमें दस हजार से अधिक विद्यार्थी पढ़ते हैं, जिसका अपना उत्कृष्टता का लंबा इतिहास रहा है, जिसने शोध और अनुसंधान में अनेक कीर्तिमान कायम किए हैं उसे एक झटके में जियो जैसे कपोल कल्पित पैराशूट इंस्टीट्यूट के समतुल्य लाकर क्यों खड़ा कर दिया गया! अगर धन और राजनीतिक संबंधों के बल पर उत्कृष्ट शिक्षा संस्थानों की सूची का निर्धारण होने लगा तो भारत का फिर से विश्व गुरु बनना तो दूर अपनी रही-सही साख बचा पाना भी मुश्किल होगा। यदि तीन साल बाद इस संस्थान के अस्तित्व में आने के बाद इसके प्रदर्शन के आधार पर इसे उत्कृष्टता सूची में शामिल किया जाता तो किसी को ऐतराज नहीं होता। लेकिन संस्थान के जन्म लेने से पहले ही उसे उत्कृष्टता के खिताब से नवाजने की हड़बड़ी समझ से परे है।

’देवेंद्र जोशी, महेश नगर, उज्जैन

किसानों की खातिर

आम चुनाव से पहले केंद्र सरकार ने 14 खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में वृद्धि की घोषणा की है। यह किसानों को उनके लागत मूल्य से 50 फीसद अधिक लाभ दिलाने के लिए सरकार का एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि न्यूनतम समर्थन मूल्यों में वृद्धि से महंगाई बढ़ सकती है और सरकारी खर्च बढ़ने से राजकोषीय घाटा हो सकता है। इससे आम जनता को भी परेशानी हो सकती है। न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि कितनी कारगर होगी और इससे कितने किसानों को लाभ मिल पाता है यह देखना अभी शेष है। बहरहाल, चुनावी साल में जनता को लुभाने वाले फैसले आगे भी किए जाएंगे। विपक्ष भी अपना लुभावना घोषणापत्र बनाने की तैयारी कर रहा है। ऐसे में जनता को जागरूक होने और लालच में न ाने की आवश्यकता है ताकि कोई भी महज लॉलीपॉप दिखा कर उसके वोट न बटोर सके।

’कशिश वर्मा, नोएडा

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