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चौपालः परीक्षा पर प्रश्न

प्रधानमंत्री ने पिछले दिनों देश के करोड़ों छात्रों के साथ परीक्षा को लेकर अपने विचार साझा किए।

Author February 21, 2018 6:08 AM
सवाल तो यही है कि छात्रों की आत्महत्याओं के लिए जिम्मेदार कौन है?

प्रधानमंत्री ने पिछले दिनों देश के करोड़ों छात्रों के साथ परीक्षा को लेकर अपने विचार साझा किए। प्रधानमंत्री द्वारा चुने गए विषय ‘परीक्षा पर चर्चा’ की संवेदनशीलता को 2016 में जारी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों से समझा जा सकता है जिसके मुताबिक भारत में हर घंटे में एक छात्र पढ़ाई के दबाव से आत्महत्या करता है। कुछ ऐसी ही हकीकत 2012 में प्रकाशित मेडिकल जर्नल लॉसेंट की रिपोर्ट बयान करती है। बहरहाल, मूल सवाल तो यही है कि छात्रों की आत्महत्याओं के लिए जिम्मेदार कौन है?

दरअसल, इस अप्रिय स्थिति के पीछे त्रिकोणीय कारक जिम्मेदार हैं। यहां त्रिकोणीय कारकों का अर्थ है शिक्षा व्यवस्था का स्वरूप, माता-पिता का असंवेदनशील व्यवहार और विद्यार्थियों में प्रतिस्पर्धा का दबाव। हमारे नीति निर्माताओं को पारंपरिक व सैद्धांतिक पाठ्यक्रम वाली रटंत विद्या में आमूलचूल परिवर्तन कर उसे आधुनिक और प्रायोगिक के साथ रुचिकर भी बनाए जाने पर विचार करने की सख्त आवश्यकता है। रुचिकर बनाने में डिजिटल तरीका एक बेहतर विकल्प हो सकता है।

इसके अतिरिक्त अभिभावकों को भी ‘सोशल स्टेट्स’ के चलते बच्चों पर अंक आधारित दबाव डालने की आदत से उबरने की जरूरत है। इस संबंध में हमारा मीडिया विभिन्न कार्यक्रमों के जरिए अभिभावकों को शिक्षित करने में अहम भूमिका निभा सकती है। देश के भावी कर्णधार परीक्षा को लेकर आतंकित न हों और प्रतिस्पर्धा की बजाय ‘अनुस्पर्धा’ की ओर प्रेरित हों इसके लिए ब्लॉक स्तर पर एक ऐसा तंत्र विकसित किया जाना चाहिए जो समय-समय पर विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करता रहे।

रवींद्रनाथ टैगोर कहते थे ‘किसी भी शिक्षा संस्थान का पहला उत्तरदायित्व पढ़ाना-लिखाना नहीं बल्कि ऐसा वातावरण तैयार करना है जिससे बच्चे स्वयं मिलकर सीख सकें।’ लगता है कि देश को जिस रचनात्मकता और नवोन्मेषता की बेसब्री से दरकार है, वह ऐसे माहौल में ही संभव है। उम्मीद है कि आगामी नई शिक्षा नीति अध्ययन, मनन, चिंतन और उपयोग पर आधारित होगी।
’विनोद राठी, नेकीराम गवर्मेंट कॉलेज, रोहतक

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