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नजर का सवाल

तंग नजर संपादकीय पढ़ा। जींस पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत की टिप्पणी को लेकर यह मुद्दा विमर्श के केंद्र में आ गया है।

womenउत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत द्वारा महिलाओं के जींस पर कमेंट करने के बाद विरोध करतीं महिलाएं। फाइल फोटो।

तंग नजर संपादकीय पढ़ा। जींस पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत की टिप्पणी को लेकर यह मुद्दा विमर्श के केंद्र में आ गया है। मुख्यमंत्री जैसे महत्त्वपूर्ण पद पर विराजे व्यक्ति के लिए किसी के कटे-फटे वस्त्र पर टिप्पणी करना उचित है या नहीं, क्या इस तरह के पहनावे से सामाजिक मयार्दा को आघात पहुंचता है, या अपसंस्कृति पनपने के खतरे हैं।

सबसे बड़ी बात कि सामाजिक मयार्दा क्या है? इसके पैमाने क्या हैं? तंग नजर भी तो सामाजिक मयार्दा का उल्लंघन है। हम लोग अक्सर इस बात को सुनते आए हैं कि खादी वस्त्र नहीं बल्कि विचार है। दिलचस्प है कि स्वाधीनता आंदोलन के दौरान भी यह स्वदेशी का प्रतीक रहा। इसकी पहचान बन गई सेवा और ईमानदारी। लिहाजा हमारे नेताओं ने स्वाधीनता आंदोलन के बाद खादी वस्त्र पहनना शुरू किया।

बाद में किन कारणों खादी धारण करने वालों का उपहास उड़ाया जाने लगा? स्पष्ट है कि पहनावे से किसी व्यक्ति के बुद्धि, विवेक एवं विचारधारा का कोई संबंध नहीं है। न ही उनकी संवेदनशीलता का आकलन किया जा सकता है। जैसे खादी वाले ईमानदार व सेवादार होने की गारंटी नहीं, उसी तरह सिर्फ कटे-फटे फैशन वाली जींस आधुनिकता व प्रगतिशील होने की निशानी नहीं।

ये भी सही है कि पश्चिम का अंधानुकरण सिर्फ पहनावे के मामले में ही न हो, बल्कि सोच के स्तर पर भी हो। बहरहाल ये व्यक्तिगत स्वतंत्रता का विषय है और मुख्यमंत्री की इस पर टिप्पणी इसी संदर्भ में ली जाएंगी। इसके निहितार्थ दूर तलक जाएंगे और गए भी।
’मुकेश कुमार मनन, पटना

शर्मनाक सोच

यह कितना शर्मनाक है कि एक मुख्यमंत्री की नजर गई भी तो तो महिला के वस्त्रों पर। इतना ही नहीं, फैशन के तौर पर पहने जाने वाली घुटनों से खुली जींस को लेकर जिस तरह का बखान उन्होंने किया, उससे तो हमारे नेताओं के मानसिक दिवालिएपन का परिचय मिलता है।

हालांकि चौतरफा विरोध होने पर उन्होंने क्षमा भी मांग ली। लेकिन क्या उन्हें अपनी सोच को लेकर जरा भी शर्म आई होगी? बेहतर होता ये मुख्यमंत्री महोदय बेहताशा बढ़ती महंगाई, घटते रोजगार, बढ़ती बेरोजगारी, गिरती शिक्षा व्यवस्था व बदहाल स्वास्थ्य सुविधाओं, बढ़ते अपराध जैसी समस्याओं पर ध्यान देते और इसी तरह बोलते।

इन जनप्रतिनिधियों चाहे वे मुख्यमंत्री हो या अन्य आम, आम आदमी की मुसीबतों, समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए, तो फिर इन्हें हवाई जहाज या खुली सड़क पर फटी जींस दिखाई नहीं देगी! जिस तरफ ध्यान देना है, उस पर से ध्यान हटाने के लि ए ही तो इधर-उधर की बातें कर जनता का ध्यान मुख्य मुद्दों से हटाया जाता है। यही तो चल रहा है, आजकल!
’हेमा हरि उपाध्याय, खाचरोद (उज्जैन)

मर्यादाहीन प्रचार

पश्चिमी बंगाल में विधानसभा चुनाव प्रचार जोरों पर है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भाजपा को आड़े हाथों लेते हुए भाजपा को गुंडों की पार्टी बताया और बंगाल की धरती पर बाहरी पार्टी भाजपा को वोट नहीं देने की अपील की। इसी तरह के कटु बोल भाजपा नेताओं की तरफ से भी सुनने को मिल रहे हैं। सत्ता हासिल करने के लिए नेताओं की वाणी में अभद्रता के सिवाय कुछ नहीं होता है। एक दूसरे पर कीचड़ उछालने और नीचा दिखाने की कोशिश की जाती है।

सत्ता के मोह में नेता उन सभी मयार्दाओं का उल्लंघन करते हैं जो उचित और अनुचित दोनों तरह से बराबर है। वोट के लिए भला-बुरा कह कर जनता को अपनी तरफ खींचने के सभी हथकंडे अपनाने में कोई दल पीछे नहीं रहता। लिहाजा मतदाता भी जानते हैं कि पांच वर्ष तक सत्ता में रहने के बाद लोगों के कितने और कैसे काम किए गए हैं। जनता को बड़े-बड़े सपना दिखा कर वोट लेने वाला कोई नेता चुनाव जीतने के बाद उसकी खबर लेने नहीं जाता। हर समय मतदाता ही ठगा जाता आ रहा है।
’कांतिलाल मांडोत, सूरत

लापरवाही का संक्रमण

शासकीय स्तर पर निगरानी में ढिलाई और जनता की लापरवाही से कोरोना संक्रमण फिर से बढ़ रहा है। हाल में प्रधानमंत्री ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ वीडियोकांफ्रेंसिंग के जरिए जो बैठक की, उससे साफ है कि हालात फिर से चिंताजनक होने लगे हैं और सुरक्षात्मक कदम के साथ निदेर्शों का पालन किया जाना जरूरी है। महाराष्ट्र और अन्य प्रदेश के शहरों में कोरोना केसमामले जिस तेजी से बढ़ रहे हैं, उसके पीछे बड़ा कारण व्यापकस्तर जांच का अभाव और लोगों द्वारा बचाव करे उपायों का पालन नहीं करना है।

इसके अलावा टीकाकरण को लेकर भी लोगों के मन में डर है क्योंकि टीका लगवाने के बाद भी लोगों के फिर से संक्रमित होने और इसके प्रतिकूल प्रभावों की खबरें सुनने को मिल रही हैं। अगर संक्रमण ज्यादा फैला तो सरकारों को फिर से पूर्णबंदी जैसे कदम उठाने को मजबूर होना पड़ सकता है। हमें यह नूत नहीं आने देनी है। इसलिए बेहतर हो हम अपने बचाव पर ज्यादा ध्यान दें। मास्क लगाएं, हाथ धोएं, दो गज दूरी के नियम का पालन करें और भीड़ से परहेज करें। तभी कोरोना को हरा सकेंगे।
’बीएल शर्मा “अकिंचन”, तराना (उज्जैन)

मौत और न्याय

करीब साढ़े तीन साल पहले (28 सितंबर, 2017) ग्यारह साल की बच्ची संतोषी की झारखंड के सिमडेगा जिले के करिमति गांव में भूख से मौत हो गई थी। तब समस्त प्रशासनिक अमने इस मौत को बीमारी बता कर अपना पल्ला झाड़ लिया था। कहते हैं देश के तमाम बीमारू प्रदेशो में लगातार भूख से मौते हो रही हैं। मगर सरकारें, हमेशा इसे बीमारी या सांप के काटने का मामला बता देती हैं। गौर करने वाली बात यह है कि परिवार और आसपड़ोस के लोग भी इन मौतों का कारण भूख ही बताते रहे हैं।

मगर प्रशासन जो कहता है, वही दुनिया को मानना पड़ता है। अब सर्वोच्च न्याययालय को पांच साल लग गए सरकार से यह पूछने के लिए कि उसने क्यों तीन करोड़ राशनकार्डों को रद्द कर दिया? इसके लिए भी चार सप्ताह का समय दिया गया। अंतत: सरकार जो कहेगी उसे ही माना जाएगा कि ये कार्ड फर्जी थे या अन्य कारण। संतोषी जैसी बच्ची की आत्मा भी भूख से तड़पती रहेगी। उसे न्याय कभी नहीं मिलेगा।
’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी,जमशेदपुर

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