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चौपालः पारदर्शिता का तकाजा

नोटबंदी के बाद से देश में डिजिटल लेन-देन में काफी बढ़ोतरी हुई है और कुछ ही नागरिक अब इस पहल से अछूते रहे होंगे। उन तक भी डिजिटल लेन-देन पहुंचने में अब देरी नहीं है लेकिन सवाल है कि यह पहल प्रशासन में कब पहुंचेगी ताकि उसमें पारदर्शिता को बढ़ावा मिले।

Author August 22, 2018 5:52 AM
आज भी रेलवे के चालान, यातायात पुलिस द्वारा काटे गए चालान, मोटर वाहनों के पार्किंग शुल्क, वेयरहाउस भंडारण आदि में डिजिटल भुगतान को नहीं अपनाया गया है

पारदर्शिता का तकाजा

नोटबंदी के बाद से देश में डिजिटल लेन-देन में काफी बढ़ोतरी हुई है और कुछ ही नागरिक अब इस पहल से अछूते रहे होंगे। उन तक भी डिजिटल लेन-देन पहुंचने में अब देरी नहीं है लेकिन सवाल है कि यह पहल प्रशासन में कब पहुंचेगी ताकि उसमें पारदर्शिता को बढ़ावा मिले। आज भी रेलवे के चालान, यातायात पुलिस द्वारा काटे गए चालान, मोटर वाहनों के पार्किंग शुल्क, वेयरहाउस भंडारण आदि में डिजिटल भुगतान को नहीं अपनाया गया है जबकि इन जगहों पर बहुत बड़ी राशि अदा की जाती है। भ्रष्टाचार की नींव भी यहीं से रखी जाती है। इससे न जाने कितने चालान, कितने पार्किंग शुल्क और कितनी ही रसीदों का हिसाब सरकार की नजरों में आने से बच जाता है। अगर यहां डिजिटल भुगतान की व्यवस्था कर दी जाए तो भ्रष्टाचार कम होने के साथ-साथ प्रत्येक चालान और शुल्क का हिसाब सुलभ हो जाएगा। इससे लोगों में डिजिटल लेन-देन के प्रति विश्वास भी बढ़ेगा, सरकारी लेन-देन में पारदर्शिता को भी बल मिलेगा।

अभिप्रिंस घुवारा, टीकमगढ़, मध्यप्रदेश

ठेंगे की खातिर

किस तरह की होड़ है यह इक्कीसवीं सदी में भी कि एक ठेंगे को पसंद-चिह्न समझ कर लोग आड़े-टेढ़े मुंह या खरगोश-बिल्ली जैसी शक्लें बना कर और पचासों स्थान बदल-बदल कर ‘पिक्स’ खिंचवाते हैं, वीडियो बनवाते हैं और उन्हें सोशल-नेटवर्किंग साइट्स पर डालते हैं। यह सब किया जाता है महज उस एक पसंद चिह्न के लिए। पर ये नहीं सोच पाते कि लोग असल में उस पसंद चिह्न के जरिए उन्हें ठेंगा दिखा कर चले जाते हैं।

सोच बदलो, समाज खुद-ब-खुद बदल जाएगा! इस बात से शायद ही कोई देश, शहर, गांव-कस्बा अनजान होगा कि महज ठेंगे को हजारों की संख्या में पाने के लिए आए दिन जोखिम वाली जगहों पर ‘सेल्फी’ लेते हुए अनेक जानें जा रही हैं। हमें खुद समझने और दूसरों को भी समझाने की कोशिश करनी चाहिए मूल्य जीवन का है, ठेंगे का नहीं। ज्ञान से प्रसिद्धि प्राप्त करो। ऐसे कार्य करके कोई प्रसिद्धि नहीं मिलती, बल्कि तुम स्वयं अज्ञान के पात्र बनते हो!

प्रज्ञा सैनी, रामलाल आनंद कॉलेज, दिल्ली

सेवा का काम

जब अपनी या अपनों की जान खतरे में होती है तो लोग ईश्वर को याद करते हैं और उसके बाद डॉक्टर को। जब कोई व्यक्ति बीमारी या घायल अवस्था में डॉक्टर के पास जाता है तो उसे उम्मीद होती है कि वह उसे ठीक कर बीमारी से छुटकारा दिला देगा। लेकिन जब वही डॉक्टर अगर अपने निजी विवादों को मुद्दा बना कर हड़ताल पर चला जाए और सेवाएं देना बंद कर दे तो यह एक अनैतिक कृत्य होगा।
इससे अनेक लोगों की जान भी जा सकती है क्योंकि डॉक्टरों का कार्य एक ईश्वरीय कार्य है लिहाजा, इसे पूर्ण समर्पण और सेवा भाव से करना चाहिए। सरकार को भी इस तरह के नियम और कानून बनाने चाहिए कि किसी भी स्थिति अथवा परिस्थिति में चिकित्सा सेवाएं बाधित न हों।

सुनील कुमार सिंह, मेरठ, उत्तर प्रदेश

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