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चौपाल: दोहरी नीति

चीन ने ताल ठोकते हुए अपने सैनिकों से युद्ध के लिए तैयार रहने को कहा है। इसी तरह चीन पिछले छह महीने से भारत की नाक में दम किए हुए हैं। चीन को सबक सिखाने के लिए भारत सरकार ने न केवल दर्जनों चीनी ऐप प्रतिबंधित किए, बल्कि उसके कई ठेकों को निरस्त कर दिया।

India- chinaभारत-चीन सीमा। फाइल फोटो।

पिछले साल जून में जब चीनी सैनिकों ने भारत के सैनिकों पर हमला किया था तब पूरे देश में चीनी सामान का बहिष्कार किया गया था, करना भी चाहिए। लेकिन अब देखने में आ रहा है कि परदे के पीछे से आज भी चीनी कंपनियों को ठेके दिए जा रहे हैं। हाल में नेशनल कैपिटल रीजन ट्रांसपोर्ट कारपोरेशन ने दिल्ली-मेरठ रैपिड रेल ट्रांजिट सिस्टम के एक हिस्से का ठेका चीनी कंपनी शंघाई टनल इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड को दिया है, जो आत्मनिर्भर भारत की हवा निकालने वाला कदम है।

आखिर हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और क्यों ? क्या जनता को मूर्ख बनाया जा रहा है! जिस चीन को लाल आंखें दिखाने की दरकार है, अब उसी चीन की कंपनियों को ठेका देकर आखिर क्या संदेश दिया जा रहा है! जबकि अभी भी चीन सीमा पर चुपचाप नहीं बैठा है। आखिर यह कैसी राजनीति है! क्या राष्ट्रभक्ति की उम्मीद केवल आमजन से की जाती है, राजनीति करने वालों से नहीं!
’हेमा हरि उपाध्याय, खाचरोद (उज्जैन)

तारीख पर तारीख

किसान संगठनों और सरकार के बीच हुई आठवें दौर की बातचीत भी बेनतीजा रही और मामला अगली तारीख पर चला गया। आखिरकार क्या कारण है कि दो दौर की बातचीत के बीच इतने दिनों का अंतराल होता है? क्या यह बातचीत का दौर लगातार कुछ दिन नहीं चल सकता? अभी तक सरकार और नए कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे देश भर के किसान संगठनों के बीच जितने भी दौर की बातचीत हुई है, उससे यह साफ हो गया है कि सरकार किसी भी कीमत पर नए कृषि कानूनों को वापस लेने पर राजी नहीं है। लेकिन हां सरकार किसानों को कृषि कानूनों में संशोधन पर विचार करने का विकल्प देती रही है। दूसरी ओर किसान संगठन कृषि कानूनों को वापस लेने से कम पर मानते नहीं दिख रहे।

अब 11 जनवरी को सर्वोच्च न्यायालय में नए कृषि कानूनों के खिलाफ जनहित याचिका पर सुनवाई पर सबकी नजर रहेगी। ऐसे में जब एक बार फिर सरकार और किसान संगठन 15 जनवरी को आमने-सामने होंगे तो बातचीत का क्या नतीजा निकलेगा, यह बहुत हद तक सर्वोच्च न्यायालय के रुख पर भी निर्भर करेगा। आठवें दौर की बातचीत बेनतीजा रहने के बाद बैठक में मौजूद कुछ किसानों ने मीडिया से बातचीत में यह बताया कि सरकार अब किसानों को नए कृषि कानूनों के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में जाने की बात कर रही है। लेकिन किसान संगठन न्यायालय जाने की बात से इनकार कर रहे हैं।

किसान संगठनों को डर है कि अगर वे सर्वोच्च न्यायालय जाते है तो फैसला उनके हित में नहीं होगा। किसानों का कहना है कि विरोध प्रदर्शन उनका संवैधानिक अधिकार है और नए कृषि कानूनों के खिलाफ यह तब तक जारी रहेगा जब तक सरकार इन कानूनों को वापस नहीं ले लेती।

ऐसे में जिस सर्वोच्च न्यायालय पर संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का दायित्व है, उस पर किसानों को भरोसा क्यों नहीं है, यह बड़ा लसवाल है। क्या किसानों को यह लगता है कि जो तारीख पर तारीख का दौर अभी सरकार के साथ चल रहा है, वही बाद में न्यायालय में भी चलने लगेगा।
’शिवम सिंह , दिल्ली विवि, दिल्ली

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