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चौपाल:अन्नदाता की मुश्किल

इधर कुछ वर्षों से हमारे अन्नदाता के सामने एक अलग तरह की समस्या पैदा हो गई है, जिसके कारण उन्हें परेशानी के साथ-साथ आर्थिक नुकसान भी हो रहा है। हुआ यह है कि पहले हल-बैलों के चलते गायों के बछड़े खेती के काम आ जाते थे, जिसे किसान जुताई के काम में लाते थे। अब जुताई का काम ट्रैक्टर से होने के कारण बछड़े या बैल बेकार हो गए हैं। जैसे ही गाय दूध देना बंद करती है, इन बछड़ों को लावारिस छोड़ दिया जाता है।

फसल खराब होने से किसान संकट में।फाइल फोटो।

हम सभी जानते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था में खेती का प्रमुख स्थान है और इसी कारण इसे कृषि प्रधान देश कहा गया है। आए दिन किसानों के लिए तरह-तरह की समस्याएं मुंह बाए खड़ी रहती हैं। वैसे भी हमारे देश की खेती को ‘मानसून के साथ जुआ’ कहा गया है। खेती अब परंपरागत नहीं रह गई है। हल-बैल लगभग गायब हो चुके हैं। आगे आने वाली पीढ़ी किताब में चित्रों के माध्यम से हल-बैल जानेगी। तरह-तरह के कीटनाशक और उर्वरक खेती मे प्रयोग हो रहे हैं। खेती करने में लागत भी काफी आने लगी है। कभी बाढ़ तो कभी सूखा और दूसरे अन्य बहुत से कारण जिसके चलते छोटे किसानों की कमर वैसे ही आमतौर पर टूटी रहती है। बढ़ते शहरीकरण ने भी खेती पर असर डाला है।

इधर कुछ वर्षों से हमारे अन्नदाता के सामने एक अलग तरह की समस्या पैदा हो गई है, जिसके कारण उन्हें परेशानी के साथ-साथ आर्थिक नुकसान भी हो रहा है। हुआ यह है कि पहले हल-बैलों के चलते गायों के बछड़े खेती के काम आ जाते थे, जिसे किसान जुताई के काम में लाते थे। अब जुताई का काम ट्रैक्टर से होने के कारण बछड़े या बैल बेकार हो गए हैं। जैसे ही गाय दूध देना बंद करती है, इन बछड़ों को लावारिस छोड़ दिया जाता है। बछड़ों को खुला छोड़ देने का परिणाम यह हो रहा है कि ये हरी-भरी खेती को चर कर साफ कर दे रहे हैं।

बहुत से किसान अब खेतों के चारों तरफ कंटीले बाड़ लगा रहे हैं, जिसमें काफी खर्चा भी आ रहा है और जो किसानों के लिए ठीक नहीं। कुल मिला कर देखा जाए तो किसान पहले से ही बहुत अच्छी हालत मे नहीं थे और अब यह नई समस्या बन आई है। सरकार ने गौशाला वगैरह बनवाना शुरू कर दिया है, लेकिन ये छुट्टा जानवर जो घूम-घूम कर फसलों को चट कर जा रहे हैं, इनको कैसे रोका जाए? जाहिर है, इसके लिए कुछ बहुत ही जरूरी कदम उठाने की जरूरत है, ताकि हमारे देश के अन्नदाता की समस्या का अंत हो सके और उनके चेहरे पर मुस्कान बनी रहे।
’राजेंद्र प्रसाद बारी, इंदिरा नगर, लखनऊ, उप्र

वक्त के साथ

धरती जटिलताओं से भरी है, चकाचौंध से सजी है और वक्त के पहियों पर सवार रहती है और हमारे लिए मात्र एक पहेली है। देखा जाए तो दुनिया में बदलाव आम बात है पर महान वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन के नियम के अनुसार जो जीव अपने को इस बदलाव में नहीं ढाल सकता, उसकी संघर्ष करने की संभावना कम हो जाती है और धीरे-धीरे वह लुप्त हो जाता है। मौजूदा दौर को दुनिया में हुए एक बदलाव के नजरिए से देखना बेहतर रहेगा।

मनाव सभ्यता को नए-नए तरीकों की परेशानियों से दो-दो हाथ होना पड़ रहा है। आज चूंकि विज्ञान और प्रौद्योगिकी का दौर है। कंप्यूटर, मोबाइल फोन और फाइव-जी का चलन है, इसलिए दिक्कतें भी इनसे संबंधित हैं। पहले से ही दर-दर ठोकरें खाने वाले गरीब परिवारों के बच्चों की स्थिति गंभीर है। संसाधनों के अभाव में बच्चों की पढ़ाई में बाधा आई है। साथ ही बुजुर्गों को मोबाइल फोन चलाने में काफी परेशानी आती है। हर जगह आपाधापी मची है, जिसके कारण आज कुछ बच्चे खुदकुशी तक कर ले रहे हैं।

ऐसे में आॅनलाइन शिक्षण का क्या हासिल होगा? पल पल की दिक्कतों ने भविष्य भी खतरे में डाल दिया है। आज की इस डिजिटल दुनिया में टिकना है तो आज भारत सरकार को अपनी युवा शक्ति को मजबूत बनाना ही होगा। जनता को कल की चुनौतियों से निपटने के लिए बेहतर डिजिटल सुविधा, उच्च शिक्षा, रोजगार और मजबूत प्रणाली लानी होगी। युवाओं को भी इस वक्त से सबक लेते हुए बदलाव से लड़ना सिखाना ही होगा।
’सुनील चिलवाल, हल्द्वानी, उत्तराखंड

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