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दमन के रास्ते

रेलवे बोर्ड मनमाने तरीके से नियम बनाता और जब चाहे उन्हें रद्द करता है।

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रेलवे ट्रैक पर प्रदर्शन करते छात्र।

रेलवे एनटीपीसी परीक्षा के परिणाम की समीक्षा की मांग कर रहे छात्रों के साथ जिस प्रकार का व्यवहार हुआ, उसे कतई उचित नहीं कहा जा सकता। रेलवे बोर्ड की परीक्षा शुरू से ही सवालों के घेरे में रही है। एक तो विज्ञापन निकलने के तीन साल बाद परीक्षा आयोजित हुई, वह भी ताली-थाली बजा कर आंदोलन करने के बाद। उसके बाद रिजल्ट में अनियमितताएं ऐसी कि छात्रों को अपनी पढ़ाई छोड़ कर धरने पर बैठने पर मजबूर होना पड़ा, जो कहीं न कहीं व्यवस्था की कमी को दर्शाता है।

जिन युवाओं के दम पर हम विश्व गुरु बनने का दम भरते हैं, अगर उन्हीं की आवाज को इस तरीके से कुचला जाए, तो इसे विडंबना ही कहा जाएगा। वर्तमान चुनावी माहौल में हर राजनीतिक दल की जुबान पर युवा है, पर कोई युवाओं की असल समस्याओं को दूर करने के लिए तत्पर नहीं दिखता। पिछले कई दिनों से सोशल मीडिया से लेकर हर जगह शांतिपूर्ण ढंग से ही धरना प्रदर्शन चलता रहा, मगर जब बोर्ड कुछ सुनने को तैयार ही नहीं, तो ऐसी गूंगी-बहरी व्यवस्था तक अपनी आवाज पहुंचाने के लिए भगत सिंह बनना ही पड़ता है।

रेलवे बोर्ड मनमाने तरीके से नियम बनाता और जब चाहे उन्हें रद्द करता है। कुछ ऐसा ही हाल रेलवे के आगामी परीक्षा ग्रुप डी में भी हुआ, जिससे छात्र असमंजस की स्थिति में हैं। अगर रेलवे ट्रैक तथा प्लेटफार्म पर प्रदर्शन करने से नौकरी नहीं मिलेगी, तो फिर किसी परीक्षा का विज्ञापन निकाल कर तीन साल बाद उसकी परीक्षा कराने की भी तो कोई सजा होनी चाहिए। हर बार छात्र ही दोषी क्यों? युवा देश के भविष्य हैं, वे भावी कर्णधार हैं, ऐसे शब्दालंकार हमें सुनने को मिलते रहते हैं, पर जब उनके हक की बात आती है, तो उन्हें लाठियां ही मिलती हैं।

आखिर ऐसा क्यों है। सोशल मीडिया पर इसे राजनीतिक रंग देने का पूरा प्रयास किया जा रहा है। कोई कहता है कि फलां सरकार में ऐसा था, तो कोई कहता है उस सरकार में ऐसा था, पर वास्तविकता यह है कि किसी भी सरकार में युवाओं की पूरी बात नहीं सुनी गई। कुछ सुनी गई तो कुछ लटकाया गया और यों ही चलता रहा। अब समय आ गया है कि इस बात पर मंथन हो कि आखिर हम युवाओं को किस प्रकार की दिशा और दशा दे रहे हैं?

  • देवानंद राय, दिल्ली

उत्तराखंड का मुस्तकबिल

उत्तराखंड राज्य की स्थापना का लक्ष्य था इस पर्वतीय क्षेत्र का चहुंमुखी विकास, लेकिन विगत दो दशकों के दौरान सिर्फ यहां के नेताओं का विकास हुआ है। इसके लिए वे मतदाता जिम्मेदार हैं, जो इनको चुनते आए हैं। इस देवभूमि में मतदाताओं को शराब परोसी और नोट दिए जाते हैं। उत्तराखंड की जनता ऐसे सब नेताओं और उनके एजेंटों को पहचानती है, जो भ्रष्ट तरीके से चुनाव जीतने में माहिर हैं। वह उन नेताओं को भी जानती है, जो कुछ वर्षों पहले तक कर्ज के बोझ में दबे थे, पर अब करोड़ों में खेल रहे हैं।

खैर, बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि लेहु वाली सलाह को याद रखते हुए मतदाताओं से यही अपेक्षा है कि वे भ्रष्ट उम्मीदवारों को कतई वोट न दें। उत्तराखंड के नेताओं में कुछ ऐसे भी हैं, जिन्हें देख कर कहना पड़ता है कि ‘धोखा पहाड़ों को दिया है बस उन्हीं ने साथियो; रोशनी के वास्ते हमने जिताया था जिन्हें!’

  • सुभाष चंद्र लखेड़ा, दिल्ली

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