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सतर्कता ही समाधान

वैश्विक महामारी कोरोना की तीसरी लहर की रफ्तार में बढ़ोतरी से लोग परेशान हैं।

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तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (Pixabay.com)

वैश्विक महामारी कोरोना की तीसरी लहर की रफ्तार में बढ़ोतरी के साथ-साथ ओमीक्रान की उत्पत्ति के बाद से देश-दुनिया के लोगों में संक्रमण की संख्या में लगातार बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। निश्चित ही कहीं न कहीं हमारी लापरवाही ही संक्रमण को बढ़ावा दे रही है। तीसरी लहर मानो तीन गुना रफ्तार के साथ सुदूर ग्रामीण इलाकों से लेकर बड़े शहरों में अपना करतब भी दिखा रही है। मगर कोरोना के वर्तमान हालात अभी सामान्य हुए ही नही थे कि जनसामान्य की खुद की लापरवाही की वजह से ही हमें बंदी जैसे हालात फिर झेलने पड़ सकते हैं। इसलिए सतर्कता से ही इस संक्रमण की समस्या का समाधान संभव हो सकेगा।

  • विभाष अमृतलालजी जैन, झाबुआ, मप्र

महिला भागीदारी

देश में जहां एक तरफ ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ अभियान चल रहा है और लिंग समानता की मिसालें पेश की जा रही हैं, वहीं चुनावी मौसम में महिला वर्ग की हिस्सेदारी और रुझान निराश करने वाला है। आगामी विधानसभा चुनाव के लिए पांच राज्यों में आए दिन अलग-अलग पार्टियां उम्मीदवारों की घोषणा कर रही हैं। प्रत्याशियों की सूची में पुरुष और महिलाओं का अनुपात चौंकाने वाला है। सोमवार को भारतीय जनता पार्टी ने उत्तराखंड में उनसठ प्रत्याशियों की पहली सूची जारी की। उसमें सिर्फ छह महिलाओं को टिकट दिया गया है, जोकि संख्या का दस फीसद है।

एक तरफ भाजपा नारी शक्ति और नारी सम्मान की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ यह अनुपात हैरान करने वाला है। इतना ही नहीं, उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी लड़की हूं लड़ सकती हूं का नारा देती हैं, पर उत्तराखंड में तिरपन उम्मीदवारों में सिर्फ पांच फीसद यानी तीन महिलाए हैं, जिन्हें चुनाव लड़ने योग्य माना गया है। हालांकि चुनाव के रण में पुरुषों के साथ-साथ महिलाएं भी समान रूप से साझीदारी करती हैं, लेकिन पार्टियां पुरुषों के प्रति ज्यादा मेहरबान रहती हैं। अगर किसी सीट से महिला प्रत्याशी होती है तो यह कयास लगाया जाता है कि जीतने के बाद महिला सिर्फ पद पर दिखाई देगी, बाकी सारे काम पुरुष ही करेंगे। महिला सीट पर पुरुष उन्हें मोहरे की तरह इस्तेमाल करते हैं। पार्टियों का यह द्वैतवाद कहीं से भी अनुकरणीय नहीं है।

  • उत्कर्ष वर्मा, प्रयागराज

नफरत के नुमाइंदे

हिंदू संगठनों द्वारा सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने पर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। जिस तरह हरिद्वार में मुसलिम समाज को लेकर अनर्गल बातें हुई थीं और उसके बाद कार्रवाइयों का सिलसिला चला था, जिसमें सभी आरोपियों को तत्काल प्रभाव से धर दबोचा गया, वैसी ही कार्रवाई हिंदू समाज के खिलाफ भड़काऊ भाषण देने वालों के खिलाफ क्यों नहीं हो रही? आखिर नीति, नियम और कानून का तकाजा तो यही कहता है कि वैमनस्य पैदा करने वाले के खिलाफ कार्रवाई में कहीं कोई भेदभाव नहीं होना चहिए। दुर्भाग्य से भेदभाव न केवल होता है, बल्कि दिखता है। जैसे यति नरसिंहानंद और कालीचरण की गिरफ्तारी हुई, ठीक वैसी ही मामले में तौकीर रजा, मोहम्मद मुस्तफा, और असदुद्दीन ओवैसी के खिलाफ क्यों कोई कारवाई नहीं की गई?

हिंदू संगठनों की शिकायतों पर विचार अभी सुप्रीम कोर्ट में होना है और हमें इंतजार करना चाहिए कि इस पर क्या फैसला आता है। ऐसे अनेक मामले कोर्ट की दहलीज तक पहुंचते हैं जिनमें, मुसलिम नेताओं और मौलानाओं के नफरती भाषणों का उल्लेख किया गया होता है, लेकिन अब तक उन पर कोई गंभीर कार्रवाई नहीं की जा सकी है।

  • पियूष कुमार, पटना

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