रिक्ति बनाम नियुक्ति

आजकल सरकारी नौकरी को पंचवर्षीय योजनाएं कहा जाए तो अतिश्योक्ति न होगी, क्योंकि वर्तमान में कोई भी ऐसी नौकरी नहीं है जिसकी प्रक्रिया पांच वर्ष से पहले पूरी हो जाए।

बेरोजगारी बनी सबसे बड़ी समस्‍या। फइल फोटो।

आजकल सरकारी नौकरी को पंचवर्षीय योजनाएं कहा जाए तो अतिश्योक्ति न होगी, क्योंकि वर्तमान में कोई भी ऐसी नौकरी नहीं है जिसकी प्रक्रिया पांच वर्ष से पहले पूरी हो जाए। स्थिति यह हो गई है कि इक्का-दुक्का को छोड़कर सरकार की हर रिक्ति में 3-5 वर्ष लग जा रहे हैं। क्या वास्तव में इतना समय लगना चाहिए, तो जवाब होगा- नहीं। इतना समय लगने का कारण है सरकारों की लापरवाही और गैर जिम्मेदराना कार्य। हाल ही में आई रिपोर्ट के अनुसार इस समय बेरोजगारी दर अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। वर्तमान में साठ लाख सरकारी पद खाली हैं और 8.72 लाख तो केवल केंद्र सरकार में।

एक तरफ बेरोजगारी बढ़ती जा रही है तो दूसरी तरफ सरकारें वेकेंसियों को किसी तरह से अटका कर युवाओं के समय को बर्बाद कर रही है। वर्तमान समय में स्थिति ऐसी है कि रिक्तियां इस चुनाव में निकलेंगी और नियुक्ति अगले चुनाव में मिलेगी। इस तरह तो सरकारें युवाओं के साथ व्यवसाय कर रही हैं। कई ऐसी भर्तियां हैं, जिनका विज्ञापन 2016-17 में आया था, लेकिन उनको अभी तक पूरा नहीं किया गया है।

आज के समय में परीक्षा होने, रिजल्ट आने और फिर नियुक्ति होने में कई वर्ष बीत जा रहे हैं। कुछ रिक्ति को तो सरकारें राजनीति करके उन्हें न्यायालय में ले जाकर रोक लगवा देती है। इस बीच यह होता है कि किसी तीन चरण वाली परीक्षा में दो चरण उत्तीर्ण कर चुके प्रतिभागी लंबे समय तक उम्मीद लगाए बैठे रहते हैं। कई बार तो सिर्फ नियुक्ति पत्र और काम शुरू करने के दिन के लिए आदेश पत्र के इंतजार में कई लोगों का न जाने कितना वक्त चला जाता है। कइयों की उम्र निकल जाती है। आखिर युवाओं और विद्यार्थियों के साथ ऐसा कब तक चलता रहेगा? हमारी सरकारें ऐसा करके साबित क्या करना चाहती हैं?
’रिंकू जायसवाल, सिंगरौली, मप्र

तनाव के बीच

पिछले साल कश्मीर में सीआरपीएफ के दो जवानों ने खुदकुशी कर ली थी। हाल ही में सीआरपीएफ के एक और जवान ने बस्तर क्षेत्र में अपने चार साथियों की गोली मारकर हत्या कर दी। इस तरह की घटनाएं क्या साबित करती हैं? जो साथी हमेशा एक दूसरे के साथ मिलजुल कर न केवल रहते हैं, बल्कि काम करते हैं, उन्हें एक दूसरे पर गोली चलाने की क्या आवश्यकता पड़ी? जाहिर है, घरों से दूर रहने, पारिवारिक कलह और अत्यंत विषम हालात में ये सैनिक काम करते हैं, फिर भी इनकी जीवनशैली बहुत मुश्किल होती है और इन्हें छुट्टी भी मुश्किल से मिलती है। 2018 से लेकर आज तक इस तरह की घटनाओं को गौर करें तो अब तक 13 घटनाओं में 18 जवानों की मौत होना मामूली आंकड़ा नहीं है।

घरों से दूर रहकर अपनी ड्यूटी निभाते हुए इन सैनिकों को अपने परिवार के प्रति भी जिम्मेदारियां रहती होंगी। इसलिए इन पर काम का बोझ और मानसिक दबाव भी अवश्य ही रहता होगा। फिर इन्हें छुट्टियां भी मुश्किल से ही मिलती हैं। इस कारण ये जवान कुछ परेशान रहते होंगे। फिर इनकी लगातार बदलती ड्यूटी के कारण भी स्थिरता नहीं रहती है। इन सब कारणों से यह जवान अवश्य तनाव में रहते होंगे। इसलिए इनकी जरूरतों पर भी ध्यान देना जरूरी है।
’मनमोहन राजावत ‘राज’, शाजापुर, मप्र

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