ताज़ा खबर
 

चौपालः नस्लवादी शब्द

मैंने गौर किया है कि जनसत्ता में अफ्रीकी मूल के अमेरिकी लोगों के लिए ‘अश्वेत’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। यह शब्द प्रचलन में है, पर यह एक नस्लवादी शब्द है।

Author June 19, 2018 4:32 AM
आज भी अंग्रेजी में ‘ब्लैक’ शब्द का इस्तेमाल होता है। क्या हम गोरे लोगों को अकृष्ण या अश्याम कहेंगे?

नस्लवादी शब्द

मैंने गौर किया है कि जनसत्ता में अफ्रीकी मूल के अमेरिकी लोगों के लिए ‘अश्वेत’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। यह शब्द प्रचलन में है, पर यह एक नस्लवादी शब्द है। अंग्रेजी में पिछले कई सालों से अफ्रीकन-अमेरिकन कहा जाता है। इसके पहले एफ्रो-अमेरिकन कहा जाता था और उससे भी पहले सिर्फ ‘ब्लैक’ कहा जाता था। साठ के दशक में ‘ब्लैक इज ब्यूटीफुल’ नामक आंदोलन भी हुआ था। उन्नीसवीं सदी में ‘नीग्रो’ (छोटे ‘एन’ के साथ) के खिलाफ लड़ाई हुई तो नीग्रो शब्द ‘बड़े ‘एन’ के साथ आया। फिर उसकी जगह ब्लैक- यह लंबी लड़ाई चली।

आज भी अंग्रेजी में ‘ब्लैक’ शब्द का इस्तेमाल होता है। क्या हम गोरे लोगों को अकृष्ण या अश्याम कहेंगे? पंजाबी को गैरबंगाली और बंगाली को गैरपंजाबी कहते हैं? तो काले लोगों को गोरों के संदर्भ में क्यों पहचाना जाए? मैं समझता हूं कि यह हिंदी समाज के लिए शर्मनाक बात है कि यह शब्द आज भी प्रचलन में है। ‘अश्वेत’ शब्द अफ्रीकी मूल के लोगों का अपमान है। वक्तके साथ ‘नारी’ या ‘महिला’ की जगह ‘स्त्री’ का इस्तेमाल बढ़ा है। प्रयोजन को देखते हुए प्रचलित शब्दों को बदला जाना कोई गलत बात नहीं है। शायद कभी हम ‘सवर्ण’ शब्द पर भी सोचें। जो वर्ण में है, वह सवर्ण है- तो क्या दलित वर्ण-व्यवस्था के बाहर रह कर दलित हैं? क्या वे अवर्ण हैं या कुवर्ण हैं? दलित का सही विलोम ‘दलक’ ही हो सकता है।

जल संकट

हाल ही में नीति आयोग द्वारा जारी समग्र जल प्रबंधन सूचकांक के मुताबिक भारत अपने इतिहास के सबसे गंभीर जल संकट के दौर से गुजर रहा है। इस भयावह रिपोर्ट को देखकर लगता है कि मौजूदा जल संकट संपूर्ण मानव जगत के लिए खतरे का संकेत है। जल प्रबंधन की खामियों को सुधार कर हम इस संकट से कुछ हद तक निपट सकते हैं। जल की उपलब्धता के आधार पर हमें सभी नागरिकों के लिए शुद्ध पेयजल की व्यवस्था करनी होगी। जल संरक्षण की मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए अमीर-गरीब सबको आगे आना होगा वरना वह दिन दूर नहीं जब सारी लड़ाइयां केवल जल संकट के कारण होंगी।

भजनलाल मेघवाल, मोरिया

लाल्टू, हैदराबाद

किताबों से दूर

इन दिनों साहित्य मेलों या समारोह में किताबों से ज्यादा युवा ‘सेल्फी’ में रुचि लेने लगे हैं। यह निराशाजनक है कि युवा आबादी का पुस्तकों के प्रति रुझान कम हो रहा है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह डिजिटल क्रांति है। सरकारी स्कूलों से लेकर निजी विद्यालय तक अपने पुस्तकालयों के लिए किताबें खरीदने पर लाखों रुपए खर्च कर रहे हैं लेकिन सच्चाई है कि मोबाइल, कंप्यूटर और इंटरनेट के दौर में पाठ्यपुस्तकों की तरफ युवाओं का रुझान कम हो रहा है। आज के दौर में जितना पैसा मोबाइल और कंप्यूटर खरीदने में खर्च हो रहा है, उससे आधा भी किताबों पर खर्च नहीं हो रहा है। उच्च माध्यमिक छात्रों के लिए अन्य पाठ्यसामग्री तो दूर की बात लगने लगती है। यह चिंता का विषय है कि युवा आबादी किताबों से दूर हो रही है।

महेश कुमार, सिद्धमुख, राजस्थान

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App