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सफलता और सरोक

यह बहुत सुकून देता है कि छोटे-छोटे रोजगार करके भी लोग अपने बच्चों में बड़े सपने देखने की चाहत भर रहे हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर

भारतीय लोक सेवा की परीक्षा में बिहार के दर्जनों छात्रों ने सफलता पाई। इनकी सफलता ने बिहार की शिक्षण व्यवस्था और परीक्षा पर उठे सवालों के बीच थोड़ी राहत जरूर दी है। मेरे जिले से भी दो छात्रों का चयन इस परीक्षा में हुआ। पूरे जनपद में इसकी खुशियां मनाई गर्इं। ऐसे छात्र ही तो दूसरों के लिए प्रेरणास्रोत होते हैं। इस बीच कुछ खबरें पढ़ीं कि सब्जी बेचने वाले का बेटा, ठेला चलाने वाले का बेटा और अन्य छोटे-मोटे कामों में लगे लोगों की संतानें इस परीक्षा में सफल रहीं। यह बहुत सुकून देता है कि छोटे-छोटे रोजगार करके भी लोग अपने बच्चों में बड़े सपने देखने की चाहत भर रहे हैं। रोजगार की घटती दर और उच्च प्रतियोगिता के दौर में लोक सेवा और पुलिस सेवा में जाने की नई पीढ़ी की इच्छा बढ़ी है। एक जमाने में छोटे बड़े किसान से लेकर मजदूर तक अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर और वकील बनाना चाहते थे। लेकिन अब इन पेशों का दौर मंद पड़ता जा रहा है। मेरे एक मित्र तो पूरा हिसाब-किताब कर समझाने लगते हैं कि एक इंजीनियर बनाने में जितनी लागत लगती है उतनी लागत में तो एक उद्योग लगाकर उसमें कई इंजीनियरों को रोजगार दे सकते हैं। सिविल सेवा की बढ़ती लोकप्रियता ने नए जमाने को जरूर आकर्षित किया है। हालांकि एक छोटे से टेक्नीशियन का काम आईएएस नहीं कर सकता, लेकिन एक कम पढ़ा-लिखा भी प्रशासन का काम कर सकता है। यह अलग बात है कि रुतबे और सरकारी खजाने के बल पर अधिकारी को कई विशेष सुविधाएं मिल जाती हैं जो बड़े-बड़े इंजीनियरों और डॉक्टरों को नसीब नहीं होतीं।

यही वह चमक है जो नौजवानों को आकर्षित करती है। वास्तव में देश सेवा की भावना से युवा वर्ग इस क्षेत्र में आते तो आज हमारी बुनियादी समस्याएं नहीं रहतीं। मेरा मानना है कि सिविल सेवा या पुलिस सेवा को चुनने वाले अस्सी प्रतिशत छात्र देशभक्ति या मानव कल्याण की धारणा को दरकिनार कर अराजक व्यवस्था का हिस्सा बनने और लूट की संस्कृति को अनवरत जारी रखने का उद्देश्य से इस सेवा में आते हैं। लोकतंत्र में ये अधिकारी एक लोक सेवक के तौर पर बहाल किए जाते हैं पर हमारी मानसिकता ऐसी बना दी गई है कि हम इन्हें अपना मालिक समझते हैं और ये हमें अपना नौकर। हमारी ऊपर की कई पीढ़ियों ने पहले राजा-महाराजाओं की छत्रछाया में समय गुजारा और फिर अंग्रेजों की। अब हम और हमारी नई पीढ़ी ने अपने ही देश के इन लोक सेवकों को माई-बाप मान लिया है। ऐसे बाबुओं-अधिकारियों को लेकर हमें तो गर्व होता है लेकिन इन्हें किसी प्रकार की शर्म नहीं होती है कि उनके पिता, चाचा, बड़े भाई की उम्र के लोग अपने छोटे-छोटे कामों के लिए इनके कार्यालय के अनगिनत चक्कर काटते फिरते है

नेता हो या अफसर, ये हमारे ही टैक्स के पैसे पर सेवा देने वाले लोग हैं पर सेवा तो दूर, ये अपने कर्तव्यों का निर्वहन भी नहीं करते हैं। यही कारण है कि विश्व आर्थिक फोरम भारतीय अफसरों के क्रियाकलाप को निम्नतम और भारत के विकास में एक बड़ी बाधा मानता है। इनकी सफलता का सरोकार बस इतना रह जाता है कि सरकार द्वारा दी गई सुविधाओं का दुरुपयोग करो, नैतिक-अनैतिक तरीके से धन अर्जित करो और आम लोगों पर गुलामों की भांति हुक्म करो! विभिन्न परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों में एक ऊर्जा होती है नई दुनिया बनाने की, अपने दम पर समाज बदलने की। लेकिन यही छात्र बड़े अधिकारी और प्रशासक वर्ग में आते ही पूर्णत: बदल जाते हैं और इसी व्यवस्था के अंग होकर रह जाते हैं। ये ओछी राजनीति की चादर में लिपट कर सभी सामाजिक सरोकारों को तिलांजलि दे देते हैं जिनके लिए वे यहां आते हैं।आज जरूरत है कुछ नया करने की। नए रास्ते बनाने वालों की ही जयकार होती है। देश सेवा के चुने गए नौनिहालों से यह उम्मीद जरूर है कि वे मुल्क की तरक्की के लिए ईमानदारी से प्रयास करेंगे।
’अशोक कुमार, तेघड़ा, बेगूसराय

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