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चौपाल: मौसम की मार

खेतों में बर्बाद फसल देख किसान खून के आंसू रो रहा है और मदद के लिए सरकार की ओर देख रहा है। अब देखना यह होगा की किसानों के नाम पर वोट मांगने वाले नेता इस पर क्या फैसला करते है। सरकार को अन्नदाताओं को मदद करनी चाहिए, ताकि उनका जो कुछ नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई हो सके।

बेमौसम बारिश ने किसानों की खड़ी फसलों को तबाह कर दिया है।

पिछले एक हफ्ते से हो रही बारिश और ओलों ने रबी फसलें तबाह कर दी हैं। दो दशक में यह पहला मौका है, जब मार्च के पहले हफ्ते में इतनी अधिक बारिश हुई है। इस बारिश और ओलावृष्टि में गेहूं, चना, सरसों आदि फसलों को भारी नुकसान हुआ है और किसानों के समक्ष गंभीर संकट खड़ा हो गया है। इससे पहले ठंड और पाला पड़ने के कारण आलू और टमाटर की खेती चौपट हो गई थी। खेतों में बर्बाद फसल देख किसान खून के आंसू रो रहा है और मदद के लिए सरकार की ओर देख रहा है। अब देखना यह होगा की किसानों के नाम पर वोट मांगने वाले नेता इस पर क्या फैसला करते है। सरकार को अन्नदाताओं को मदद करनी चाहिए, ताकि उनका जो कुछ नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई हो सके।
’नीतीश कुमार पाठक, औरंगाबाद (बिहार)

रिहाई से उम्मीदें
पिछले साल पांच अगस्त के बाद फारूक अब्दुल्लाह के बारे में जब पूछा गया था तो जवाब आया- नहीं, वे घर पर हैं। फिर जब पूछा गया कि वे संसद सत्र में क्यों हिस्सा नहीं ले रहे हैं, तो बताया गया था कि वे अपने मर्जी से घर पर बंद हैं, सरकार उन्हें गोद में बिठा कर तो संसद में नहीं ला सकती। कुछ दिन और बीते तो कहा गया कि उन्हें जन सुरक्षा कानून (पीएसए) के तहत गिरफ्तार किया गया है। गिरफ्तारी का कारण बताया कि इनके बाहर रहने से कश्मीर में दंगा हो सकता है। शांति भंग हो सकती है। यानी भविष्य का ख्याल करके कार्रवाई की गई। पिछले दिनों दिल्ली में जिन नेताओं ने भड़काऊ भाषण दिए, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। लेकिन जनता सब समझती है। देर आयद दुरुस्त आयद। फारूक अब्दुल्लाह को रिहा कर दिया गया। अभी भी एक हजार के करीब लोग जेलों में बंद है। अगर जमहूरियत को कायम रखना है तो इन सभी की फौरन रिहाई होनी चाहिए।
’जंग बहादुर सिंह, जमशेदपुर

जागरूक उपभोक्ता
जागो ग्राहक जागो- जनहित में जारी एक लोकप्रिय नारा है। यह वास्तव में उपभोक्ताओं को अपने अधिकारों के प्रति जागृत करने का एक सरकारी प्रयास है। भारत ही नहीं, अपितु पूरे विश्व में बढ़ते बाजारवाद ने उपभोक्ता संस्कृति को बढ़ावा दिया जा रहा है। लेकिन अभी भी उपभोक्ताओं में जागरूकता की भारी कमी है। व्यापारी व उद्यमी वर्ग जहां वस्तुओं में मिलावट, नापतौल में कमी, व्यापारियों द्वारा अधिकाधिक मुनाफा कमाने और निज स्वार्थ की पूर्ति के लिए अनैतिक तरीके अपना कर ठगने का कुप्रयास किए जाते हैं, वहीं भ्रामक और झूठे विज्ञापनों के जरिए लोगों को लुभाने की प्रवृत्ति बहुत बढ़ गई है। ऐसे में उपभोक्ताओं को अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों के प्रति जागृत करने, बाजार में होने वाली जमाखोरी, कालाबाजारी, मिलावटी सामग्री का वितरण, एमआरपी से अधिक दाम वसूलने, बिना मानक वस्तुओं की बिक्री और नाप तौल में गड़बड़ी जैसी अनियमितताओं के प्रति ग्राहकों को जागरूक करने के उद्देश्य से उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम बनाए गए। निश्चय ही जनहित में जारी यह प्रयास तभी सार्थक हो सकता है जब हम उपभोक्ताओं के अधिकारों व कर्तव्यों को सामान्य जन तक पहुंचाने में सफल होंगे।
’मंजर आलम, रामपुर डेहरू (मधेपुरा)

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