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बजट का हलवा

अखबारों में पूरे पेज के विज्ञापन निकाल कर अपनी आर्थिक स्थिति का भले यशोगान किया जा रहा हो, लेकिन आमतौर पर सभी अखबारों में आखिरी से पहले पेज पर छपी आर्थिक रिपोर्टें उसे झुठलाती रहती हैं।

Author नई दिल्ली | February 29, 2016 12:24 AM
केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सोमवार (29 फरवरी) को आम बजट पेश किया।

सार्वजनिक उपक्रमों की पूंजी और संपदा निजी कारोबारियों के हाथ लुटा कर कितने दिन इसे राजस्व प्राप्ति और आय का हिस्सा मानने का जश्न मनाएंगे? निरंतर महंगाई और दुश्वारियों से पीड़ित आम आदमी को सबसिडी और किसी भी तरह की राहत से गुरेज, जबकि कॉरपोरेट को कर राहतें और कर-माफी पर खुश होती सरकार के राज में सरकारी बैंकों के डूबते ऋण लाइलाज हो रहे हैं। 1.14 लाख करोड़ रुपए की जा पहुंची डूबत ऋणों की राशि ने इन बैंकों के लाभ को पतीला लगा दिया है। गत एक तिमाही में इन बैंकों के लाभांश का सड़सठ प्रतिशत हिस्सा चहेते कॉरपोरेटों के डूबत ऋण चट कर गए हैं। डूबत ऋणों से एक तिमाही में इन बैंकों के लाभ में बारह हजार करोड़ रुपए की घात लगी है।

कोल ब्लॉक नीलामी कोयला उद्योग से निजीकरण की शुरुआत हो गई है। इस्पात उद्योग नुकसान में जा रहा है। जबकि चीन और जापान से इसका आयात जारी है। निर्यात की तुलना में आयात के बढ़ते जाने से व्यापार घाटा निरंतर बढ़ता जा रहा है। डॉलर के मुकाबले रुपए का विनिमय मूल्य गिर कर 68.30 तक चला गया है। औद्योगिक स्थिति लगातार निराशाजनक बनी हुई है। जो थोड़ी बहुत बढ़ोतरी सेवा क्षेत्र में हो रही थी, उस पर भी सेवाकर को बोझ डाल कमजोर कर दिया गया है। बेहतर परिणाम देने वाला जीवन बीमा क्षेत्र 14.5 प्रतिशत के सेवाकर के बोझ से कराह उठा है। जीवन बीमाधारकों पर अब अपनी जीवन सुरक्षा के लिए चुकाई जाने वाली प्रीमियम पर अचानक 14.5 प्रतिशत से अतिरिक्त भार सेवाकर का लद गया है। न उद्योग की प्रगति की कोई वैकल्पिक नीति है, न कृषि में सुधार की। उत्पादन क्षेत्र लगातार गिरावट में है।

अखबारों में पूरे पेज के विज्ञापन निकाल कर अपनी आर्थिक स्थिति का भले यशोगान किया जा रहा हो, लेकिन आमतौर पर सभी अखबारों में आखिरी से पहले पेज पर छपी आर्थिक रिपोर्टें उसे झुठलाती रहती हैं। इन हालात के बीच ‘मेक इन इंडिया’ खालिस नारा भर लगता है। कामगारों की सामाजिक सुरक्षा के समुचित उपाय और बजट की उपेक्षा जारी है। जिस विदेशी निवेश का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, रिजर्व बैंक के आंकड़े उसके घटने की ताकीद कर रहे हैं। आॅटोमोबाइल क्षेत्र में विदेशी कंपनियों की प्रतिस्पर्धा खूब दिख रही है। आमतौर पर सभी नामचीन कार कंपनियां भारतीय बाजार में धूम मचा रही हैं, लेकिन उसमें काम करने वाले बहुमत कामगार ठेके पर हैं, जिनकी कोई नौकरी सुरक्षा नहीं है और उनके उत्पीड़न की घटनाओं से अखबार रोज रंगे नजर आते हैं। ऐसे में बजट और हलवा किसके लिए है!
(रामचंद्र शर्मा, तरूछाया नगर, जयपुर)
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उम्मीदों की खेती
‘मुसीबत की खेती’ लेख पढ़ कर अनायास मुझे मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास की एक कहानी ‘पूस की रात’ का चित्रण याद आया। हमारे देश के अन्नदाता के हाल उस कहानी के पात्र हल्कू जैसे हो जाते हैं। उनके ऐसे हाल लंबे समय से चले आ रहे हैं। देश की खेती मौसमी है और मौसम के हाल सर्वविदित है कि यह अनियमित और अनिश्चित है। हमारे पालनकर्ता तुल्य किसान जब पैदावार को मुसीबत की खेती समझने लगें तो यह संकट अन्नदाता का नहीं रह कर देश का संकट बन जाता है। ऐसे में देश के कर्ता सरकार द्वारा ही किसानों और कृषि में सुधार के लिए कार्यक्रम लाकर देश के संकट का निवारण किया जाता है।

वर्तमान सरकार द्वारा इस दिशा मे विभिन्न कार्यक्रमों द्वारा उठाए गए कदमों का नतीजा आना अभी बाकी है, लेकिन इसकी सराहना की जा सकती है। इस दिशा नई फसल बीमा योजना और आधुनिक समय की मांग के चलते कृषि क्षेत्र को भी तकनीक से लैस बनाना एक आशान्वित कदम साबित होगा। अप्रैल माह से शुरू हो रहे डिजिटल कृषि विपणन मंच द्वारा अन्नदाता की मुसीबत की खेती का उम्मीदों की खेती में बदलने की आशा की जा सकती है। (खुशबू शर्मा, जयपुर)
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विरोध का चेहरा
आरक्षण की मांग को लेकर जाटों द्वारा चलाए गए आंदोलन से एक बार फिर यह साबित हो गया कि कैसे किसी भी विरोध प्रदर्शन या जायज-नाजायज मांगे मनवाने के लिए सार्वजनिक संपत्ति को सबसे आसान शिकार बनाया जाता है। आरक्षण की यह मांग बहस का विषय हो सकती है, पर यह तो साफ है कि एक सभ्य समाज और विकसित राष्ट्र बनने के लिए आर्थिक संवृद्धि से आगे बढ़ कर भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।

यह भी स्पष्ट हो गया कि मात्र भारत माता की जय बोलने से और तिरंगा झंडा फहराने से ही हम सच्चे देशभक्त नहीं बन जाते, बल्कि राष्ट्रीय हितों को व्यक्तिगत हितों से ऊपर रखना और राष्ट्रीय संपत्ति की रक्षा करना अधिक जरूरी है। भारत को आजाद हुए और लोकतंत्र बने साठ से भी ज्यादा साल अवश्य हो गए हैं, पर लोकतांत्रिक मूल्यों को अपनाने के लिए जिस परिपक्वता और उत्तरदायित्व की भावना की जरूरत है, उसका सत्ता पक्ष और आम जनता दोनों में अभाव दिखता है। कितना अच्छा होता अगर अपने अधिकारों की मांग करने वालों ने संविधान पढ़ा होता तो शायद उन्हें पता चलता कि उसमे वर्णित मूल कर्तव्यों में से एक सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना और हिंसा से दूर रहना भी है। (अनिल हासानी, हलालपुरा, भोपाल)
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पटरी पर रेल
रेल बजट में जो निर्णय लिए गए हैं, उसमें जनता से कई वायदे किए गए हैं। खासकर रेल किराए में बढ़ोतरी नहीं की गई। और भी कई ऐसे मुद्दे हैं जो रेल बजट में शामिल किए गए हैं। अगर इन्हें अमल में लाया जाता हैं तो रेल यात्रा में अच्छा बदलाव देखा जा सकता है। यात्री अब रेल यात्रा पर अधिक भरोसा कर सकेंगे। खासकर अगर दिल्ली के रिंग रेलवे स्टेशन पर यात्रियों की सुरक्षा के सही इंतजाम किए जाते हैं तो एक अच्छा बदलाव देखा जा सकता है। इससे दिल्ली में बढ़ रहे प्रदूषण को भी काफी हद तक कम करने में सहायता मिलेगी। देखना यह है कि कब तक इन सभी बातों पर अमल किया जाता है। (मोहम्मद सुहैल, दिल्ली)

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