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चौपालः लोक से सलूक

हमारे देश में वीआइपी संस्कृति को प्रतिबंधित करने के दावे तो बहुत किए जा रहे हैं लेकिन आज भी यहां वीआइपियों की संख्या अन्य देशों से कहीं ज्यादा है।

Author July 5, 2018 6:59 AM
प्रतीकात्मक चित्र

लोक से सलूक

हमारे देश में वीआइपी संस्कृति को प्रतिबंधित करने के दावे तो बहुत किए जा रहे हैं लेकिन आज भी यहां वीआइपियों की संख्या अन्य देशों से कहीं ज्यादा है। इनकी सुरक्षा में लाखों जवान हर समय तैनात रहते हैं जिसकी वजह से जनता की सुरक्षा और उसके हित से जुड़े बहुत सारे काम प्रभावित होते हैं। किसी शहर में जब कोई वीआईपी आता है तो मुख्य रास्ते को रोक दिया जाता है जिससे लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। अगर गलती से भी कोई उस रास्ते पर चला गया तो सुरक्षाकर्मियों की घुड़की उसे कंपा देती है। वह अपने कदम आगे बढ़ाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है। वीआइपी सुरक्षा की आड़ में आम नागरिकों से जैसा व्यवहार किया जाता है वह किसी तानाशाही में ही होता है। लोकतंत्र में ‘लोक’ से ऐसा सलूक ठीक नहीं है।

नीरज यादव, इलाहाबाद

कब तक

हाल में एक विदेशी संस्था के सर्वे ने भारत को महिला सुरक्षा के विषय में विश्व का सबसे पिछड़ा हुआ देश बताया है। इस सर्वे के अनुसार युद्ध से टूट चुका सीरिया भी हमसे आगे है। मीडिया और समाज के एक तबके ने इसे पूरी तरह नकार दिया है। वहीं इसी बीच लखनऊ में बेरहमी के साथ एक युवती का कत्ल और बलात्कार हुआ और सात साल की बच्ची के साथ मंदसौर में क्रूरता की तमाम हदें पार कर दी गर्इं। इससे पहले उन्नाव और कठुआ कांड की बर्बरता ने हमें हिला कर रख दिया था।

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हिंदुस्तान एक जल्दी भूल जाने वाला देश है। आज कठुवा केस में क्या हो रहा है यह कोई नहीं जानता है। उसके दोषियों को अभी तक सजा क्यों नहीं मिली यह भी एक अहम सवाल है। उन्नाव के मामले में क्या हुआ इससे भी बहुत कम लोग वाकिफ हैं। देशवासी कठोर कानून के लिए सीना पीटते हैं लेकिन सिर्फ कानून से क्या होगा, जब तक गुनहगार को सजा नहीं मिलेगी? बलात्कार पर अंतरराष्ट्रीय आलोचना को झुठलाना पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद को झुठलाने के समान है। गलती सुधारने के लिए तो पहले गलती मानना जरूरी है। निर्भया दबी आवाज में हमसे रोज पूछ रही है कि आखिर यह सब कब तक चलेगा?

अलीशान जाफरी, दिल्ली विश्वविद्यालय

मौत का मोक्ष

यह बहुत अफसोसनाक है कि इक्कीसवीं सदी में भी हमारे देश में ‘मोक्ष प्राप्ति’ जैसे अंधविश्वास कायम हैं। धर्म, अध्यात्म और आस्था का यह देश जरूर है मगर जब इनके कारण लोग आत्महत्या करने लगें तो हमें अपनी सोच बदलने की जरूरत है। उत्तरी दिल्ली के बुराड़ी क्षेत्र के एक मकान में रविवार की सुबह ग्यारह लोग मृत पाए गए जिनमें सात महिलाएं थीं। उस घर में जो नोट मिले हैं और शवों के पोस्टमॉर्टम से पता चला है कि यह हत्या नहीं बल्कि सामूहिक आत्महत्या का मामला है। क्या हमें ईश्वर के इतना करीब चले जाना चाहिए कि इस दुनिया से ही दूर हो जाएं?

धर्म हमें बुरे कामों से रोकता है। संस्कृति हमें करीब लाती है। कहा जाता है कि संसार में एक अदृश्य शक्ति जरूर है जो इस ब्रह्मांड का संचालन कर रही है। मगर इन बातों को प्रमाणित नहीं किया जा सका है। हम बस मानते हैं, हमारी आस्था है, हमें विश्वास है। मगर उस विश्वास के लिए अगर हम जान देने लग जाएं तो उससे बड़ा अंधविश्वास भला और क्या हो सकता है!

जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी

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