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चौपाल: मुश्किल में श्रमिक

जिस तरह से देश के तमाम हिस्सों एवं राज्यों से मजदूर अपने अपने घर को पलायन करने को मजबूर हैं, उससे उद्योग जगत गंभीर मुश्किलों में पड़ सकता है। सवाल यह है कि मजदूरों के पलायन के बाद उद्योग जगत नए सिरे से शुरूआत कैसे करेंगे?

india lockdown, crime, crime newsट्रेन का टिकट खरीदने के लिए कई लोगों ने उधार लिया। सांकेतिक तस्वीर। (Express Photo By Pradip Das/File)

मजदूर और उद्योग एक दूसरे के पूरक होते हैं। मजदूरों का पलायन एक तरह से उद्योग जगत का पलायन है। मौजूदा संकट ने हमें यह दिखाया कि हम अपने मजदूरों और निम्न वर्ग के लोगों का कितना ख्याल रखते हैं। मजदूरों की दयनीय हालत हमारी सरकारों और रणनीति व योजनाएं बनाने वालों की विफलता का परिणाम है। साथ ही इन घटनाओं ने कंपनियों के मालिकों की असंवेदनशीलता का भी परिचय दे दिया है।

जिस तरह से देश के तमाम हिस्सों एवं राज्यों से मजदूर अपने अपने घर को पलायन करने को मजबूर हैं, उससे उद्योग जगत गंभीर मुश्किलों में पड़ सकता है। सवाल यह है कि मजदूरों के पलायन के बाद उद्योग जगत नए सिरे से शुरूआत कैसे करेंगे? बिना मजदूरों के कुटीर उद्योग हों या फिर बड़े कारखाने, इनके संचालन की कल्पना की ही नहीं जा सकती। इस वक्त दो तिहाई से ज्यादा मजदूर अपने-अपने घरों को लौटने लगे हैं। वर्तमान में इनसे ज्यादा दयनीय स्थिति किसी की भी नहीं है। केंद्र सरकार ने बीस लाख करोड़ रुपए के आर्थिक पैकेज का एलान तो कर दिया है, लेकिन जब मजदूर ही नहीं रहेंगे तो ये उद्योग चलेंगे कैसे?

इस स्थिति के लिए कहीं न कहीं उद्योगों के स्वामी भी जिम्मेदार हैं, क्योंकि कंपनियां लाभ कमाने के समय तो मजदूरों को अपने साथ रखती हैं, पर विपत्ति के समय मजदूरों का साथ छोड़ देती हैं। अब जरूरत है कि असंगठित क्षेत्र के इन दिहाड़ी मजदूरों को लेकर सशक्त नियम कानून बनें, जिसमें उनकी दैनिक मजदूरी, पीएफ, पेंशन, स्वास्थ्य संबंधी निराकरण आदि का निर्धारण होना चाहिए। आपातकाल की स्थिति में कोई भी कंपनी उन्हें काम से न निकाले और इस दौरान उन्हें वेतन आदि सुविधाओं का हर तरीके से लाभ मिले। ऐसे दृढ़ संकल्प, नियमों के साथ ही हम मजदूरों के पलायन को रोक सकते हैं ।
’संजय कुमार सिंह, धनबाद

काम से रुकेगा पलायन
महामारी संकट ने अप्रवासी मजदूरों को वापस घर लौटने पर मजबूर कर दिया है। काम ठप्प है और पास में पैसे नहीं होने के कारण मजदूर पैदल, साइकिल से, या किसी अन्य स्रोत से वापस आ रहे हैं। परेशानी का आलम यह है कि वे लोग फिर से बाहर जाने के नाम पर सिहर उठते हैं। लेकिन बाहर कमाने जाना उनकी मजबूरी बन जाती है क्योंकि राज्य सरकारें अपने राज्य में काम नही दे पातीं। बिहार से लाखों मजदूर कमाने बाहर जाते हैं, इसलिए बिहार सरकार अपने बंद पड़े कारखाने को जल्द चालू करने की दिशा में ठोस कदम उठाए और सभी मजदूरों को काम मुहैया करवाए। सिर्फ घोषणा कर देने से काम नही चलेगा, धरातल पर काम होना चाहिए। वरना मजदूरों के पलायन को रोकना मुश्किल है।
’जफर अहमद, मधेपुरा ( बिहार)

आत्मनिर्भर भारत
सरकार ने स्वदेशी पर जोर देने के उदेश्य से आत्मनिर्भर भारत का आह्वान किया है। अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए यह अच्छा कदम है, परंतु क्या लोकल या वोकल होने से अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट आएगी? जनता तो खाने-पीने की वस्तुओं के लिए स्वदेशी को प्राथमिकता देगी, लेकिन क्या सरकार और अधिकारी स्वदेशी को प्राथमिकता देंगे। भारत में स्वदेशी के बारे में अधूरी बातों को ही प्रसारित किया जाता रहा है। स्वदेशी का मतलब टुथपेस्ट, दूध, वस्त्र, साबुन, आदि ही बताया गया है। जबकि असली और पूर्ण स्वदेशी का मतलब होता है सुई से लेकर जहाज तक भारत में बने और भारतीयों द्वारा बने। सरकार स्वयं विदेशी गाड़ियों का प्रयोग करती है, क्या भारतीय गाडियां विकल्प नहीं हो सकती।
’भूपेंद्र सिंह रंगा, हरियाणा

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