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चौपाल: मजबूरी के मजदूर

कुछ दिन पहले ही औरंगाबाद में हुए रेल हादसे का मंजर पूरे देश ने देखा। जहां एक साथ पटरी पर लेटे सोलह मजदूरों की जान चली गई। इस दृश्य ने सरकार सहित पूरे देश को सकते में डाल दिया। यह सिलसिला यहीं नहीं रुकता। उसके कुछ दिन बाद ही गुना में बस-ट्रक की टक्कर में सड़क हादसे में नौ मजदूरों की जान चली गई।

lockdown migrant workersरविवार को गाजीपुर बॉर्डर पर लगी प्रवासी मजदूरों की भीड़। (एएनआई)

मजबूरी के मजदूर
महामारी ने देश के लाखों-करोड़ों उन दिहाड़ी मजदूरों की भयावह तस्वीर दिखाई है, जिसे देख कर मन तो व्यथित होता ही है, कई प्रश्न भी उठते हैं। आखिर ये मजदूर अपने गांव, शहर और राज्य को छोड़ कर दूसरे राज्यों में मजदूरी करने क्यों जाने को मजबूर हैं? पिछले कुछ दिनों से हर तरफ मजबूरी के मजदूरों की अलग-अलग शहरों से भयावह तस्वीरें देखी जा रही हैं। कभी नंगे पैर ही वैशाख-ज्येष्ठ की इस तपती धूप में सड़कों पर दौड़ते कदम, तो कहीं इनके कटे, छिले, जले पैर। इतना ही नहीं, अपने घरों की ओर लौटते वक्त सड़क हादसों में अपनी जान गंवाने के मंजर। ये दृश्य सहज ही मन को व्यथित करते हैं।

कुछ दिन पहले ही औरंगाबाद में हुए रेल हादसे का मंजर पूरे देश ने देखा। जहां एक साथ पटरी पर लेटे सोलह मजदूरों की जान चली गई। इस दृश्य ने सरकार सहित पूरे देश को सकते में डाल दिया। यह सिलसिला यहीं नहीं रुकता। उसके कुछ दिन बाद ही गुना में बस-ट्रक की टक्कर में सड़क हादसे में नौ मजदूरों की जान चली गई। अब फिर ट्रक हादसे में चौबीस लोगों के मरने की खबर। ऐसी न जाने कितनी ऐसी घटनाएं हो रही हैं, जहां बेबस और लाचार मजदूर अपने घरों की ओर वापसी करते समय खुद को या अपने परिजनों को खो रहे हैं।

सवाल है कि आखिर राज्य सरकारें इन प्रवासी मजदूरों की मजबूरी के विषय में क्यों नहीं सोचती? क्यों इन्हें अपने ही राज्यों या शहरों में संचालित कुटीर, लघु सहित अन्य उद्योगों से जोड़ कर रोजगार उपलब्ध करवाने में मदद करती। ताकि ये मजबूरी के मजदूर दूसरे राज्यों या शहरों की ओर पलायन न करें और अपने ही शहरों और राज्यों में रह कर रोजगार से जुड़ सकें।

अगर सरकारें कोई खास नीति बना कर काम करती हैं, तो निश्चित तौर पर आने वाले समय में फिर से देश आर्थिक रूप से गति पकड़ेगा और अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। फिर कोई मजदूर रोटी की तलाश में मजबूर होकर दूसरे राज्यों की ओर कदम नहीं बढ़ाएगा और तभी भारत आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ेगा।
’प्रवीण पांडेय, भोपाल

आत्मनिर्भरता की राह
हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति में एक खास तरह की दूरदर्शिता थी, जिसका हम आज के परिदृश्य में भली-भांति अनुभव कर सकते हैं। हमारे यहां हरियाली की रक्षा की जाती थी। पानी की एक-एक बूंद सहेज कर रखी जाती थी। गांव आत्मनिर्भर हुआ करते थे। अपनी जरूरत का हर सामान गांव में ही पैदा होता था। अंग्रेजों से लड़ाई लड़ते हुए गांधीजी ने इस बात को भली-भांति समझ लिया था और इसीलिए उन्होंने स्वदेशी को अपनाने पर जोर दिया था। आज फिर से गांधीजी के सिद्धांतों को अपनाने की आवश्यकता है।

आजादी के बाद से ही अगर हम गांधीजी के सिद्धांतों पर चले होते तो आज हर गांव आत्मनिर्भर होता। कुटीर उद्योग और लघु उद्योग से हर गांव संपन्न होता। जब तक गांव संपन्न और आत्मनिर्भर नहीं होंगे, भारत भी संपन्न और आत्मनिर्भर नहीं हो सकता।
’नवीन थिरानी, नोहर

अपने भरोसे
हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने महामारी से निपटने में देश के नागरिकों के सहयोग की बात कही। इसके तहत अपने स्वदेशी उत्पादन में गुणवत्ता और स्थानीय बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की बात कही। उन्होंने इस संकट को भारत के लिए एक संदेश या अवसर की तरह बताया, जिससे हम दुनिया में भारत के योगदान को बढ़ा सकते हैं। इसके लिए हमें भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए काम करना होगा।

भारत विश्वपटल पर उभरती हुई शक्ति है, जिसका लोहा आज अमेरिका और चीन भी मान रहे हैं। इसके लिए भारत के खुद के प्रयास कारगर साबित हुए हैं। भारत को अब वैश्विक शक्ति बनने के लिए अपने बुनियादी ढांचे और आपूर्ति शृंखला को और भी ताकतवर बनाना होगा। इसके लिए सभी संसाधनों का कुशलता से उपयोग करना होगा।
’गौरव मिश्रा, ललितपुर, उप्र

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