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प्रकृति के साथ

गीता का सार है- ‘पल-पल परिवर्तन ही संसार का नियम है।’ लगता है मनुष्य उपर्युक्त उक्ति को चरितार्थ करने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहा है और यह मेहनत तकनीकी एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हो रही है।

summerसांकेतिक फोटे।

गीता का सार है- ‘पल-पल परिवर्तन ही संसार का नियम है।’ लगता है मनुष्य उपर्युक्त उक्ति को चरितार्थ करने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहा है और यह मेहनत तकनीकी एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हो रही है। मैं यह कभी नहीं कह सकता हूं कि प्रौद्योगिकी विकास का खराब क्षेत्र है। इसने जीवन को बेहद आसान बनाया है, लेकिन अति हर चीज की खराब होती है। आज मनुष्य प्रकृति की सत्यता को चुनौती देता हुआ उसे हराने के लिए अपना दिमाग बढ़ा रहा है। ऐसे-ऐसे तथ्यों को उद्घाटित कर रहा है जो कल्पना से परे है। एक स्तर तक यह मीठा जहर अच्छा लगता है, लेकिन वास्तविकता को नकारा नहीं जा सकता।

आज हम आमतौर पर लोगों को स्वच्छ हवा के लिए मास्क लगाते, बगीचों में स्वच्छ हवा लेने जाते देख सकते हैं। पानी को स्वच्छ करने के लिए कई सारे यांत्रिक वस्तुओं का उपयोग करना, घर के भीतर दवाओं का आधा अस्पताल बनाना आदि उदाहरण को बड़ी आसानी से देख सकते हैं। ये सब बातें चिंतनशील हृदय को झकझोरने के लिए काफी हैं। लेकिन मनुष्य को दोनों हाथों में लड्डू चाहिए। एक तरफ तो वह विलासिता का जीवन चाहता है और साथ ही कामना करता है कि स्वच्छ फल, सब्जी, आयुर्वेदिक दवाओं आदि का सेवन करे। यह क्या है?

आज का शिक्षित वर्ग, जिससे हम अपेक्षा कर सकते हैं कि वह जागरूक बनेगा और बाकी लोगों को भी जागरूक बनाएगा। लेकिन इस दायित्व से भी वह बचना चाहता है। इसका प्रमाण यह है कि वह जीवंत प्रकृति को जड़ समझता है। शिक्षित वर्ग को यह समझना पड़ेगा कि पर्यावरण का सैद्धांतिक ज्ञान प्रायोगिक ज्ञान के सामने अंश मात्र है। इस कथानक को लेखनीबद्ध करने का औचित्य तब तक अपूर्ण है, जब तक इस विषय को पढ़ने और जानने-समझने वाला इसे आत्मसात नहीं करता। जितना प्यार आप अपने परिजनों से करते हैं, अपने बच्चों से करते हैं, उससे भी कई गुना प्रकृति से करें, क्योंकि समस्त जीव-जगत का यही भविष्य है।
’हितेश राजपुरोहित, दिल्ली विवि, नई दिल्ली

जल का प्रबंधन

देश में जैसे-जैसे ग्रीष्म ऋतु का आगमन होता है, वैसेझ्रवैसे जल स्तर नीचे जाता है। कई विशेषज्ञों द्वारा राय या सलाह दी जाती है, नीति आयोग की रिपोर्ट प्रस्तुत की जाती है और चिंता जताई जाती है। लेकिन इस समस्या से निपटने के लिए वास्तव में होता कुछ नहीं है। अक्सर यह देखा गया है कि अधिकतर सरकारी संस्थान में जल की सुविधा उपलब्ध रहती है, लेकिन अधिकतर जल की बर्बादी भी यही होती है। कहीं जल व्यर्थ बह रहा है, तो कहीं नल टूटे-फूटे हैं। कोई इस समस्या पर ध्यान देने को तैयार नहीं है। दूसरी ओर, ग्रामीण इलाकों में देखा जाए तो पानी की कुछ ज्यादा ही समस्या होती है। कई जगहों पर तो महिलाओं को दूर से कुएं, तालाब या हैंडपंप से पानी लाना पड़ता है। इससे उनके स्वास्थ्य में गिरावट आती है। ऐसी जगहों पर पर पानी की बचत की जाती है। महामारी के दौर में स्थिति अधिक दयनीय हो गई है।

हाल में प्रस्तुत नीति आयोग की रिपोर्ट में बताया गया है कि साठ फीसद भूमिगत जल का उपयोग सिंचाई में किया जाता है जो कि भू-जल में कमी का मुख्य कारण है। इसलिए सरकार, समाज, सिविल सोसायटी आदि को जल के प्रति जागरूकता लाने का काम करना होगा। वही कारगर सरकारी उपाय करने होंगे। इनमे नीदरलैंड की समुद्र से खारा पानी को उपयोग में लाने की तकनीक अपना सकते है, जिससे चेन्नई जैसे शहरों में अमल में लाया जा सकता है।अन्यथा स्थिति भयावह हो जाएगी और आॅक्सीजन की तरह ही पानी की जरूरत महसूस होगी।
’संजय रावत, बुरहानपुर, मप्र

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