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चौपाल: किसके नुमाइंदे

आज जरूरत ऐसे नेताओं की है जो धर्म, जाति की बात पर वोट न मांगे, बल्कि देश की अखंडता की बात करे, जनता के जीवनयापन से जुड़े मुद्दों पर बात करे। साथ ही संविधान में प्रावधान करना चाहिए कि जो नेता काम नहीं करे या किए वादों पर खरा न उतरे, उसे नागरिकों को वापस बुलाने का अधिकार हो।

Author Updated: October 30, 2020 1:33 AM
राजनीति में बढ़ते अपराध। फाइल फोटो।

हालांकि राजनीति में आपराधिक छवि वाले नेताओं के मामले में समूचे देश में तस्वीर कोई बहुत अलग नहीं है, लेकिन बिहार के चुनावी रण में उम्मीदवारों को देख कर लगता है कि दल चाहे जो भी हो उनके नुमाइंदे एक जैसे ही हैं। जब एक तिहाई उम्मीदवार आपराधिक पृष्ठभूमि के हों और इतने ही करोड़पति, तो लगता है कि देश में जनसेवकों की बहुत कमी है।

सभी दलों का एक ही उद्देश्य है कि जैसे भी हो उसका उम्मीदवार जीतने वाला हो, फिर वह चाहे अपराधी हो या बलात्कारी। हम कैसा देश और समाज बनाना चाहते हैं इन जनप्रतिनिधियों के सहारे? क्या आज सभी दलों की नैतिकता खत्म हो गई है? क्या देश प्रेम और राष्ट्रवाद की बात करने वाला दल भी दलदल नहीं बन गया? इन दलों और इनके मुखिया से जो उम्मीदें थी, वे शायद झूठी थीं।

अब खुद आम जनता को जागना होगा, अगर देश का लोकतंत्र जिंदा रखना है। वरना मौजूदा लगभग सभी दलों से तो यह उम्मीद रखना बेमानी होगा कि वे जनहित में कोई सुधार करेंगे। आज राजनीति का एक ही उद्देश्य बच गया लगता है कि येन केन प्रकारेण सत्ता हथियाना। उसके लिए चाहे अपने सिद्धांतों को ही तोड़ना पड़े। इसलिए आम नागरिक के उठ खड़े होने का समय आ गया है। अभी भी अगर वह नहीं जागा तो देश में न लोक बचेगा, न लोकतंत्र।

आज जरूरत ऐसे नेताओं की है जो धर्म, जाति की बात पर वोट न मांगे, बल्कि देश की अखंडता की बात करे, जनता के जीवनयापन से जुड़े मुद्दों पर बात करे। साथ ही संविधान में प्रावधान करना चाहिए कि जो नेता काम नहीं करे या किए वादों पर खरा न उतरे, उसे नागरिकों को वापस बुलाने का अधिकार हो। यही नहीं जो भी दल या नेता जाति, धर्म के आधार पर वोट की अपील करे, उसके चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाया जाए।
’मुनीश कुमार, रेवाड़ी, हरियाणा

स्वच्छ हवा में

पर्यावरण को बचाना आज हमारी सबसे बड़ी जरूरत है। हमारी परंपरा और संस्कृति में पर्यावरण के संरक्षण की बात कही गई है। पर्यावरण के बगैर मानवीय जीवन का अस्तित्व संभव नहीं है। दीपावली साफ-सफाई का पर्व है। लेकिन यह बात जानते हुए भी हम क्यों अपने पर्यावरण को अपने आसपास के वातावरण को प्रदूषण से भर देते हैं? वर्तमान में हमने प्रकृति के कहर को देखा।

हम सब अपने-अपने घरों के अंदर रहने को विवश हुए थे और इस बात से भी हम सब भली प्रकार से परिचित हैं कि हमारे घरों के अंदर रहने के कारण घर से बाहर प्रदूषण जो हमारे कारण फैलता है, हमारे दैनिक क्रियाकलापों द्वारा फैलता है, वह बहुत कम हुआ। इसके कारण हमें प्रकृति के बहुत सुंदर दृश्य न जाने कितने वर्षों बाद देखने को मिले। ये सारे दृश्य उस आपदा काल में भी हम सभी के लिए सुखकारी थे। लेकिन अब वक्त के साथ प्रदूषण भी फिर से बढ़ रहा है।

अब दीपावली भी बहुत ही समीप आ गई है। प्रतिवर्ष दीपावली पर करोड़ों रुपयों के पटाखों का व्यापार होता है। पटाखों से बसाहटों, व्यावसायिक, औद्योगिक और ग्रामीण इलाकों की हवा में तांबा, कैल्शियम, गंधक, एल्यूमीनियम और बेरियम प्रदूषण फैलाते हैं। उल्लिखित धातुओं के अंश कोहरे के साथ मिल कर अनेक दिनों तक हवा में बने रहते हैं। और इस वजह से प्रदूषण का स्तर कुछ समय के लिए काफी बढ़ जाता है।

गौरतलब है कि विभिन्न कारणों से देश के अनेक इलाकों में वायु प्रदूषण सुरक्षित सीमा से अधिक है। ऐसे में पटाखों से होने वाला प्रदूषण भले ही अस्थायी प्रकृति का होता है, लेकिन उसे और अधिक हानिकारक बना देता है। औद्योगिक इलाकों की हवा में राख, कार्बन मोनोआॅक्साइड, कार्बन डाइआॅक्साइड, सल्फर डाइआॅक्साइड और अनेक हानिकारक तथा विषैली गैसें और विषाक्त कण होते हैं। इन इलाकों में पटाखे फोड़ने से प्रदूषण की गंभीरता तथा होने वाले नुकसान का स्तर कुछ दिनों के लिए बहुत अधिक बढ़ जाता है।

महानगरों में वाहनों के र्इंधन से निकले धुएं के कारण सामान्यत: प्रदूषण का स्तर सुरक्षित सीमा से अधिक होता है। पटाखे उसे कुछ दिनों के लिए बढ़ा देते हैं। उसके कारण अनेक जानलेवा बीमारियों मसलन, हृदय रोग, फेफड़े, गॉल ब्लाडर, गुर्दे, यकृत एवं कैंसर जैसे रोगों का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए हमें यह ध्यान रखना होगा कि दीपावली खुशियों की दीपावली हो, प्रदूषण की नहीं।
’काव्यांशी मिश्रा, मैनपुरी, उप्र

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