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सेहत की सुध

भारत की गिनती दुनिया के उन देशों में होती है जहां स्वास्थ्य के मद में सरकारी ख्रर्च सबसे कम है। आर्थिक वृद्धि दर, निर्यात, विनिर्माण जैसे कई मामलों में भारत में चीन से होड़ का रुझान दिखता है। लेकिन कल्याणकारी कामों में यह प्रतिस्पर्धा क्यों नहीं दिखती? गौरतलब है कि हमारे देश में स्वास्थ्य पर […]

भारत की गिनती दुनिया के उन देशों में होती है जहां स्वास्थ्य के मद में सरकारी ख्रर्च सबसे कम है। आर्थिक वृद्धि दर, निर्यात, विनिर्माण जैसे कई मामलों में भारत में चीन से होड़ का रुझान दिखता है। लेकिन कल्याणकारी कामों में यह प्रतिस्पर्धा क्यों नहीं दिखती? गौरतलब है कि हमारे देश में स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च जीडीपी के महज एक फीसद के करीब है, जबकि चीन में जीडीपी का तीन फीसद। अमेरिका में यह 8.3 फीसद है, जहां यों भी औसत क्रय-शक्ति बहुत ज्यादा है। लिहाजा, अपने देश में अरसे से यह मांग उठती रही है कि सेहत के मद में सरकारी आबंटन बढ़ाया जाए। पर विडंबना यह है कि इसे बढ़ाना तो दूर, मोदी सरकार ने उलटे इस साल स्वास्थ्य-बजट में बीस फीसद की भारी कटौती कर दी है।

इस कटौती का क्या असर होगा इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। एचआइवी-एड्स नियंत्रण से लेकर कुपोषण निवारण तक तमाम स्वास्थ्य-कार्यक्रमों पर इस कटौती की गाज गिरेगी और उन्हें लक्ष्य के अनुरूप चलाना संभव नहीं होगा। एचआइवी-एड्स नियंत्रण के मद में तीस फीसद की कटौती की गई है, जबकि इस रोग के पीड़ितों की संख्या के लिहाज से भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर है। मिड-डे मील और एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम जैसी योजनाएं भ्रष्टाचार और बदइंतजामी के अलावा आबंटन की कमी का भी शिकार रही हैं।

सर्वोच्च न्यायालय कई दफा मिड-डे मील के निहायत अपर्याप्त आबंटन पर सरकारों को फटकार लगा चुका है। सरकारी अस्पतालंों की बदहाली भी किसी से छिपी नहीं है। प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर जिला अस्पतालों तक चिकित्सा उपकरणों, बिस्तरों और अन्य सुविधाओं की कमी भयावह रूप ले चुकी है। इसका सबसे ज्यादा खमियाजा उन लोगों को भुगतना होता है जो निजी अस्पतालों का खर्च नहीं उठा सकते और इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों पर निर्भर रहते हैं।

भारत में यह संख्या कितनी बड़ी है यह बताने की जरूरत नहीं होनी चाहिए, जहां दुनिया के सबसे गरीब लोगों की एक तिहाई आबादी रहती है। ऐसे में सेहत के मद में छह हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की कटौती घोर संवेदनहीन कदम है। भाजपा यह कहती आई है कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकारी आबंटन बढ़ाया जाना चाहिए। अपने चुनाव घोषणापत्र में भी उसने इस बात की वकालत करते हुए सरकारी अस्पताओं में मुफ्त दवाई और निशुल्क निदान का वादा किया था। फिर कुछ समय पहले मोदी सरकार ने कहा कि अगले वित्तवर्ष से चिकित्सा को बुनियादी अधिकार बनाया जाएगा और सबको चिकित्सा बीमा की सुविधा दी जाएगी। लेकिन स्वास्थ्य-बजट को और सिकोड़ कर तो वह उलटी दिशा में जा रही है! क्या इसी तरह चिकित्सा-सुविधा को नागरिक अधिकार बनाया जाएगा?

यह सही है कि राजकोषीय घाटा चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया है और इसे कम करने के लिए सरकार को अपने खर्चों को घटाने की जरूरत महसूस हो रही है। पर राजकोषीय घाटे से निपटना है तो सरकार को फिजूलखर्ची रोकने के अलावा बकाया करों की वसूली पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अगर वित्त मंत्रालय राजकोषीय घाटे को लेकर इतना चिंतित है तो बड़ी-बड़ी कंपनियों को कर-रियायतें क्यों जारी रखे हुए है? सरकारी बैंकों के बड़े बकाएदारों से वसूली की मुहिम क्यों नहीं चलती? स्वास्थ्य के सरकारी खर्च पर कुल्हाड़ी चलाना कमजोर तबकों की उपेक्षा करना ही माना जाएगा। क्या सबका साथ सबका विकास का नारा इसी तरह फलीभूत होगा?

 

विनय रंजन, मुकर्जी नगर, दिल्ली

 

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